एंट्रिक्स-देवास करार: दोषी वैज्ञानिकों पर इसरो कसेगी नकेल

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इसमें न केवल गंभीर प्रशासनिक और प्रक्रियागत चूक हुई, बल्कि कुछ लोगों की ओर से मिलीभगत जैसा बर्ताव भी किया गया। ऐसे में कार्रवाई किए जाने के लिए जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। समिति ने कहा कि ऐसा जान पड़ता है कि देवास को इस सौदे के लिए चुनने में पारदर्शिता नहीं दिखाई गई। इस सौदे की मंजूरी प्रक्रिया के दौरान केंद्रीय मंत्रिमंडल और अंतरिक्ष आयोग को अधूरी और गलत सूचनाएं दी गईं।
समिति ने कहा है कि 28 जनवरी, 2005 को ही एंट्रिक्स-देवास सौदे पर साइन हुए लेकिन इस बारे में अंतरिक्ष आयोग को नहीं बताया गया। 27 नवंबर, 2007 को केंद्रीय मंत्रिमंडल के नोट में भी यह जानकारी नहीं दी गई थी, जिसमें जी सैट-6 के लॉन्चिंग के लिए मंजूरी मांगी गई थी। यह इस करार के तहत बनाए जाने वाले सैटलाइट्स में से एक था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि एंट्रिक्स-देवास सौदे की शर्तें पूरी तरह से देवास के पक्ष में थीं। इसमें कहा गया है कि सौदे की शर्तों के मुताबिक सैटलाइट की नाकामयाबी की सूरत में जोखिम पूरी तरह से अंतरिक्ष विभाग का होगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया, ' यह हैरान करने वाला है कि फैसले के लिए देवास को एक इंटरनेशनल कंपनी माना गया, जबकि उसका रजिस्टर्ड अड्रेस बेंगलुरु में दिखाया गया है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अंतरिक्ष विभाग और वित्त मंत्रालय के कानूनी विभागों से एंट्रिक्स-देवास सौदे के लिए कोई परमिशन नहीं ली गई, जबकि यह भारत सरकार द्वारा किए जाने वाले किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते के लिए जरूरी होती है। गौरतलब है कि एंट्रिक्स इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) की व्यावसायिक इकाई है, जबकि देवास एक प्राइवेट कंपनी है।












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