पहले रामदेव अब सुब्रत राय पर स्याही, अगर ये तेजाब होता तो?

योग गुरु बाबा रामदेव पर दिल्ली में शनिवार को काली स्याही फेंकने की घटना ने देश भर में हलचल मचायी तो दिग्विजय सिंह जैसे नेता तो इस मामले पर चुटकी लेने से भी पीछे नहीं हटे, लेकिन क्या उन्हें इस वारदात की गंभीरता का अहसास है? जरा सोचिए अगर वो पेन कांच का बना होता और उसमें स्याही की जगह तेजाब होता, तो क्या होता? उत्तर साफ है, आज देश के कई हिस्से उसी तेजाब में जल रहे होते। स्याही फेंकने वाला कामरान भले ही पुलिस की गिरफ्त से आजाद हो गया है, लेकिन इस घटनाक्रम ने देश, सरकार और मीडिया के सामने कई सवाल खड़े कर दिये हैं।
प्यार-मोहब्बत और नफरत के चलते तेजाबी हमले की वारदातों के बारे में आप हमेशा से सुनते आये होंगे। तेजाब से झुलसे लोगों का क्या हाल होता है, यह भी आप बखूबी जानते होंगे। ऐसे हमलों में तमाम लड़कियां व महिलाओं की मौत हो गई, या फिर उनकी जिंदगी ने उन्हें मर-मर कर जीने के लिए छोड़ दिया। अब अगर बाबा रामदेव की बात करें तो शनिवार को उनके मुंह पर प्रसवार्ता के ठीक बाद दिल्ली के कामरान सिद्दीकी ने उनके मुंह पर पेन से स्याही फेंक दी। स्याही उनकी आंख व चेहरे पर पड़ी।
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अब सोचिए अगर कामरान के हाथ में उस कलम की जगह कांच की टेस्ट ट्यूब होती और स्याही की जगह तेजाब, तब क्या होता। आज जो बाबा रामदेव देश के काले धन को वापस लाने व राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने की मांग कर रहे हैं, वो अस्पताल में होते। यही नहीं देश भर में उनके समर्थक सड़कों पर उतर आये होते। और तो और कई शहर सांप्रदायिक दंगों की भेंट चढ़ गये होते।
इसके लिए जिम्मेदार कौन है? इस सवाल का उत्तर खोजने निकलें तो उंगली सीधे सुरक्षा तंत्र की ओर जाती है। बाबा रामदेव की सुरक्षा के प्रबंध इतने कमजोर हैं, कि कोई भी गैर-पत्रकार व्यक्ति उनकी प्रेसवार्ता में चला जाता है, और करीब डेढ़ घंटा बिताने के बाद इस वारदात को अंजाम देता है। यहां पर जिम्मेदारी उस मीडियाकर्मी की भी बनती है, जो अपने साथ कामरान को लेकर गया।
अब अगर ये कहें कि मीडिया वालों से प्रेसकार्ड क्यों नहीं मांगा गया, तो उसके जिम्मेदार खुद मीडियाकर्मी ही हैं। देश में तमाम पत्रकार हैं, जो प्रेसकार्ड दिखाना अपनी तौहीन समझते हैं। तमाम ऐसे पत्रकार हैं, कार्ड दिखाने की बात पर ऐसे बिफर जाते हैं, मानों उनकी इज्जत ही उतार दी हो। तमाम लोग ऐसे भी हैं, जो प्रेस कार्ड मांगने पर कहते हैं, "हमको नहीं जानते हम फलां अखबार से हैं.... तुम्हारी औकात क्या है, जो मुझसे कार्ड मांग रहे हो... ये कोई पीएम या प्रेसिडेंट का मूवमेंट नहीं, जो तुम्हें कार्ड दिखाऊं।"
यही कारण है कि अधिकांश प्रेसवार्ताओं में गेट पर खड़े सुरक्षाकर्मी प्रेसकार्ड दिखाने को नहीं कहते। वह भी यही सोच लेते हैं, " इन मीडिया वालों से कौन भिड़े।" पत्रकारों और सुरक्षाकर्मियों के बीच इन्हीं संबंधों के कारण ही किसी ने कामरान का प्रेसकार्ड नहीं मांगा। खास बात यह है कि कामरान के बारे में खुलासा होने से पहले तक टीवी पर लाइव देख रहे लोग उसे पत्रकार ही समझ रहे थे।
सुरक्षा को लेकर फुर्ती नहीं
एक अंतिम बात जो सामने आती है वो है बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जैसे लोगों की सुरक्षा। सच पूछिए तो सरकार इन दोनों की सुरक्षा को लेकर जरा भी फुर्ती नहीं दिखाती है। हाल ही में बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में अन्ना की सुरक्षा में कुछ दर्जन सुरक्षाकर्मी मौजूद थे, वो भी भीड़ और ट्रैफिक को नियंत्रण करने में जुटे हुए थे। अन्ना के मंच के पास जाने में कोई चेकिंग नहीं लगी थी। विडंबना यह है कि सुरक्षातंत्र ने मेटल डिटेक्टर लगाया भी तो वो भी सिर्फ मीडियाकर्मियों और वरिष्ठ नागरिकों की चेकिंग के लिए।
यदि सरकार अन्ना और रामदेव की सुरक्षा के सजग नहीं हुई, तो आगे चलकर किसी बड़ी वारदात के रूप में अंजाम भु्गतना पड़ सकता है और वह देश के लिए किसी दुर्भाग्य से कम नहीं होगा।
Did You Know: बाबा रामदेव ने अपने छात्र जीवन में स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिसमिल द्वारा अनुवादित औरबिंदो घोष की किताब यौगिक साधन पढ़ने के बाद ही हिमालय की गुफाओं मं रहने चले गये थे।












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