बिना ट्रायल नहीं बनेगी आयुर्वेदिक दवाएं

समझा जाता है कि सरकार के इस कदम से अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में आयुर्वेदिक दवाओं की विश्वसनीयता कायम हो सकेगी। विदेशों में भारतीय आयुर्वेदिक दवाओं की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि भारतीय बाजारों में दो हजार करोड़ रुपये की आयुर्वेदिक दवाएं सालाना बेची जाती हैं। जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में लगभग 11,500 करोड़ रुपये की यानी प्रतिवर्ष लगभग 13,500 करोड़ रुपये का कारोबार अभी हो रहा है।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर यह भी सवाल उठाए जाने लगे हैं कि बिना वैज्ञानिक परीक्षण के इन दवाओं का सेवन कितना सुरक्षित है? आयुर्वेदिक दवाओं के खिलाफ केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को काफी शिकायतें मिल रही हैं। ज्यादातर शिकायतें भारी लौह तत्वों को लेकर रहती हैं। दवाओं में मौजूद भारी लौह शरीर में मौजूद लौह तत्वों को और बढ़ा देता है जिससे शरीर पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
इसलिए एलोपैथी दवाओं की तरह आयुर्वेदिक दवाओं के भी क्लीनिकल ट्रायल कराए जाएंगे। आयुर्वेदिक, सिद्धा और युनानी दवाओं के लिए नीतिगत दिशानिर्देश हैं लेकिन दवाओं का मिश्रण इतना जटिल होता है जिसका प्रभाव साधारण तरीके से नहीं जाना जा सकता है। क्लीनिकल ट्रायल के दौरान जोखिमों की जवाबदेही आयुर्वेदिक डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की होगी।
दिशानिर्देश के तहत जोखिमों की जानकारी देकर परीक्षण में भाग लेने वालों की सहमति लेनी होगी। अधिकारी का कहना है कि दवाओं की गुणवत्ता और मानकता तय करने के लिए यह पहला कदम है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का आयुष विभाग नीतिगत समिति, मुआवजे की राशि, परीक्षण की प्रकृति समेत कई तरह के नियम बना रहा है। गर्भ में पल रहे भ्रूण की रक्षा के लिए गर्भवती महिलाओं को किसी भी तरह के परीक्षण में शामिल नहीं किया जा सकता। ऐसी महिलाओं के लिए दिशानिर्देश में मुआवजे का प्रावधान भी नहीं किया गया है।
एलोपैथी दवाओं के लिए केंद्रीय दवा मानक नियंत्रण संगठन यानी सीडीएससीओ के दिशानिर्देश की तरह ही आयुर्वेदिक दवा परीक्षण दिशानिर्देश तैयार किए गए हैं। दवाओं का परीक्षण शुरू करने से पहले दवा कंपनी को पंजीकरण कराना होगा। कंपनी को मानवाधिकार और दवाओं की विश्वसनीयता साबित करने के लिए परीक्षण के आंकड़े रखने होंगे।












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