लापरवाह मंत्रियों की कुर्सी वापस, नहीं मिला पीडि़तों को न्‍याय

26/11 terror attack: Politician back in Power, victims still await of a rehabilitation
मुंबई। आज ही के दिन 2008 में मुंबई में सबसे विनाशकारी आतंकी हमला हुआ। इसी दिन 175 बूकुसूरों की जान गई और इसे याद किया जाने लगा 26/11 के नाम से। इतने बड़े आतंकी हमले के बाद देश की राजनीति में भी उबाल आ गया। अचानक ही देश और मुंबई की सुरक्षा का जिम्‍मा संभालने वाले मंत्री आम जनता की आखों की किरकिरी बन गए। इनमें शामिल थे तत्‍कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल, महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री बिलासराव देशमुख और महाराष्‍ट्र के गृहमंत्री आरआर पाटिल। आनन-फानन में इन तीनों की छुट्टी कर दी गई।

समय बदला और राजनीति ने फिर अपना रंग दिखाया। सरकार को इंतजार था कि लोगों के दिमाग से इस आतंकी हमले की यादें कम हो जाए। इसके बाद सरकार ने अपने इन खास नुमा‍इंदों को फिर से वापस बुला लिया। जिन लोगों को इस आतंकी हमलों के बाद उनके पदों से बर्खास्‍त कर दिया गया था उनकी फिर से जोरदार वापसी हुई। शिवराज पाटिल पंजाब के गवर्नर बनाए गए हैं। आरआर पाटिल फिर से महाराष्‍ट्र के गृहमंत्री बन गए। इतना ही नहीं महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री पद की कुर्सी गंवाने वाले विलासराव देशमुख की केंद्र सरकार में वापसी हुई।

यह आलम नौकरशाही के साथ भी रहा। जहां नेताओं को उनकी कुर्सी वापस मिली तो नौकरशाहों की तो छुट्टी ही नहीं की गई थी। जिस समय मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था। वहां के कमिश्‍नर हसन गफूर थे। सुरक्षा व्‍यवस्‍था में हुई लापरवाही की वजह से उन पर राम प्रधान जांच कमेटी बैठाई गई थी। गृहमंत्रालय ने कमेटी की रिपोर्ट पर कोई कार्रवई किए बिना हसन गफूर को प्रमोशन दे दिया। वे हाल ही में मुंबई क्राइम ब्‍यूरो के आईजी पद से रिटायर हुए हैं। इस दौरान उन पर कोई मामला दर्ज नहीं किया गया।

सरकार ने इन नेताओं और नौकरशाहों का भला कर दिया लेकिन उस आम जनता के बारे में कुछ नहीं सोचा जो इस हमले का शिकार हुई थी। इस हमले में मारे गए लोगों के परिजनों को न तो मुआवजा मिला और न ही उन्‍हें अभी तक न्‍याय मिला है। इस आतंकी हमले में पकड़े गए कसाब को फांसी की सजा दी जा चुकी है। फिर भी उसे फांसी पर नहीं लटकाया जा रहा जबकि हर भारतीय चाहता है कि कसाब को फांसी हो और हमले में मारे गए लोगों को न्‍याय मिले। समय के साथ लोगों की उम्‍मीदें भी जवाब दे रही हैं और उन्‍हें लगने लगा है कि कसाब की फांसी पर भी अफजल गुरू की फांसी की तरह रोक न लग जाए। जो संसद पर हमले का साजिशकर्ता है। सरकार इस आतंकी हमले में मारे गए लोगों को भले ही मुआवजा न दे पाई हो लेकिन अजमल कसाब पर उसने इन तीन साल में लगभग 50 करोड़ रुपए फूक डाले हैं। पूछताछ के नाम पर कसाब को फांसी पर नहीं लटकाया जा रहा है।

इतना विनाशकारी आतंका सहने के बाद भी न तो भारतीय सरकार चेती और न ही यहां की सुरक्षा व्‍यवस्‍था में कोई तेजी आई। इसके बाद भी कई आतंकी हमले हुए। 13 जुलाई 2011 को आतंकियों ने मुंबई की धरती पर एक बार फिर वार किया। जिसका सुराग भारत अभी तक नहीं लगा पाया। आतंकियों ने देश की राजधानी दिल्‍ली को भी दहला दिया। आतंकी बार-बार भारत की सरजमी पर हमला कर रहे हैं लेकिन यहां कोई मदहोशी से बाहर आने को तैयार नहीं है। बस एक काम हमारी सरकार करती है वह है कि हर साल बड़े आतंकी हमले की बरसी पर पूरे देश में अलर्ट जारी कर दिया जाता है। बाकी बचे हुए दिनों में जनता की सुरक्षा भगवान के सहारे छोड़ दी जाती है।

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