कांग्रेस भी क्‍यों चाहती है उत्‍तर प्रदेश के टुकड़े करना?

Sriprakash Jaiswal
लखनऊ। मायावती सरकार ने जल्‍दबाजी में आकर शीतकालीन सत्र के दौरान महज पांच मिनट में उत्‍तर प्रदेश के बंटवारे का प्रस्‍ताव विधानसभा में पारित कर दिया। इस प्रस्‍ताव का भाजपा और समाजवादी पार्टी ने खुलकर विरोध किया, लेकिन कांग्रेस किनारे खड़ी रही। पहले मौखिक विरोध दर्ज करती रही, लेकिन अब कह रही है कि वो भी चाहती है कि राज्‍य का बंटवारा हो जाये। इस सियासी खेल में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर कांग्रेस अचानक पलट कैसे गये। आखिर वो यूपी का बंटवारा क्‍यों चाहती है?

इस सवाल के जवाब ढूंढ़ने से पहले चलते हैं घटनाक्रम की ओर जहां प्रस्ताव पारित होने के बाद कांग्रेस ने जल्द ही राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन करने का आश्वासन दिया है। केन्द्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा है कि जल्दी ही राज्य पुनर्गठन आयोग के गठन का फैसला लिया जाएगा। विधानसभा सत्र में मुख्यमंत्री मायावती ने उत्तर प्रदेश के चार टुकड़े करने का प्रस्ताव पारित करा दिया और अब गेंद केन्द्र के पाले में है।

जायसवाल ने कहा कि आर्थिक, राजनीतिक, प्राकृतिक संसाधनों और अन्य आवश्यक चीजों पर गहन अध्ययन के बाद ही समुचित कार्रवाई की जाएगी। कांग्रेस ने प्रदेश के चार भागों में बंटवारे सम्बन्धी प्रस्ताव को विधानसभा से पारित कराने के तरीके की आलोचना की है और कहा है कि जल्दी ही दूसरे पुनर्गठन आयोग का गठन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पौने पांच साल तक चुप रहने वाली मायावती ने अपनी असफलताओं से ध्यान हटाने के लिए यह प्रस्ताव पारित करवाया।

जायसवाल ने कहा कि मायावती यदि राज्य के बंटवारे के प्रति गंभीर होती तो राष्ट्रीय विकास परिषद, प्रधानमंत्री और केन्द्रीय योजना आयोग की बैठकों में इसे उठातीं, चिट्टी लिखने से कुछ नहीं होता। उन्होंने कटाक्ष किया कि मायावती राज्य के विकास को लेकर कितना गंभीर है यह इसी बात से पता चलता है कि वह राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में स्वयं जाने के बजाय अपना प्रतिनिधि भेजती हैं।

उन्होंने समाजवादी और भारतीय जनता पार्टी को कटघरे में खड़ा किया और कहा कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में आज इन दलों ने जो दृश्य प्रस्तुत किया है उससे लगता है कि ये आपस में मिले हुए हैं। इनके रवैये की वजह से मायावती सरकार को साफ बच जाने का मौका मिल गया। केन्द्रीय कोयला मंत्री ने सपा व भाजपा को दोष देते हुए कहा कि इन लोगों के कारण अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा नहीं हो सकी।

सपा और भाजपा को कोसने वाली कांग्रेस ऐकाएक माया के सुर में सुर कैसे मिलाने लगी। चुनावी समीकरण देखें तो केंद्र में कमजोर पड़ती साख का असर अब कांग्रेस को दिखाई देने लगा है। कांग्रेस के पास फिलहाल कोई बड़ा मुद्दा नहीं था, जिसके बल पर वो चुनाव लड़ सके। चूंकि बंटवारे का मामला अब केंद्र के पाले में है और वहां कांग्रेस की ही सरकार है, इसलिए उसे इस मामले को भुनाने की सबसे ज्‍यादा जल्‍दी है।

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