केंद्र व यूपी सरकार के बीच फंसी सीपीएमटी प्रवेश परीक्षा

CPMT exam webbed between Center and UP govt
लखनऊ। एमबीबीएस प्रवेश परीक्षा केन्द्र सरकार व राज्य सरकार के आपसी झगड़े में फंसती जा रही है। एक ओर जहां केन्द्र चाहता है कि एमबीबीएस के लिए देश में एक ही परीक्षा (नेशनल एलिजबिलिटी कम एंटे्रंस टेस्ट) हो वहीं यूपी सरकार इस परीक्षा में शामिल होने को तैयार नहीं है। केन्द्र व राज्य के बीच उठे इस विवाद में छात्रों का भविष्य अधर में लटकता दिखायी दे रहा है। छात्रों के सामने यह प्रश्न है कि आखिर वह प्रवेश परीक्षा की तैयारी किस आधार पर करें। फिलहाल चिकित्सा शिक्षा विभाग ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है।

बस कुछ दिन और सीपीएमटी (कम्बाइंड प्री-मेडिकल टेस्ट) का कार्यक्रम तय होने का समय आ जाएगा लेकिन चिकित्सा शिक्षा विभाग के सामने समस्या यह है कि वह सीपीएमटी में एमबीबीएस, बीडीएस, बीएचएमएस, बीयूएमएस व बीएएमएस की परीक्षा साथ कराए या फिर एमबीबीएस की सीटें परीक्षा से अलग कर दी जाएं। कारण यह है कि केन्द्र सरकार स्वास्थ्य मंत्रालय ने एमबीबीएस की देश व्यापी परीक्षा कराने का निर्णय लिया है। हालांकि राज्य सरकार ने केन्द्र के इस निर्णय का मानने से इनकार कर दिया लेकिन अभी तक एमसीआई की ओर से कोई प्रतिक्रिया दर्ज नहीं करायी गयी है।

अधिकारी बताते हैं कि एमसीआई केन्द्र सरकार के फैसले के खिलाफ नहीं जाएगी लेकिन यदि ऐसा होता है तो यूपी कोटे की एमबीबीएस सीटें विवाद में फंस सकती हैं। उधर छात्र भी असमंजस की स्थिति में हैं। यूपी बोर्ड (हिन्दी मीडियम) के छात्रों के सामने समस्या यह है कि सीपीएमटी परीक्षा का प्रश्न पत्र हिन्दी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं में होता है। यदि एमबीबीएस की एक परीक्षा होगी तो उसमें हिन्दी भाषा का प्रयोग किया जाएगा ऐसा कहना मुश्किल है। दूसरी सबसे बड़ी समस्या फीस की होगी क्योंकि सभी मेडिकल कालेजों की फीस समान नहीं है ऐसे में गरीब व निर्धन छात्र एम्स जैसे संस्थाओं में पढऩे का खर्च नहीं उठा सकेंगे।

जानकारों का मानना है कि प्रवेश परीक्षा में सफल होने वालों को कालेज में दाखिला मैरिट व रैंक के आधार पर मिलेगा ऐसे में कोई भी छात्र देश के किसी भी कोने में जा सकता है। छात्रों के लिए यह भी एक बड़ी समस्या होगी, क्योंकि भाषा व भौगोलिक परिवेश के आधार पर बंटे देश में हिन्दी बोलने वाले छात्रों का रह पाना काफी कठिन होगा। ऐसे ही ढेरों प्रश्न हैं जिनके उत्तर फिलहाल न महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा दे पा रहे हैं और न ही एमसीआई के अधिकारियों के पास ही इनका जवाब है।

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