चल पड़ी लखनऊ के ऐतिहासिक घंटाघर की घड़ी

घंटे ने जैसे ही पांच बार बजकर यह अहसास कराया कि पांच बज गए है पार्क में खड़े लोगों को पुराने समय की याद ताजा हो गयी। लोगों ने तालियां बजाकर खुशी का इजहार किया। घंटाघर की घड़ी तथा घंटा सही होने के उपरान्त हुसैनाबाद ट्रस्ट के सचिव अपर जिलाधिकारी ओम प्रकाश पाठक ने बताया कि बीते वर्ष अप्रैल से घड़ी की मरम्मत का कार्य शुरू किया गया था। घड़ी की मूल मशीन बनाने के उपरान्त घड़ी को सफलतापूर्वक चालू किया गया और आज घंटा भी सफलतापूर्वक चालू किया गया।
पाठक ने बताया कि अभी घंटाघर में क्वार्टर चाइमिंग का काम, घंटाघर की बालकनी तथा शिखर की मरम्मत का सिविल कार्य शेष है, जो मार्च 2012 तक पूरा हो सकेगा। उन्होंने बताया कि घंटाघर की मरम्मत और घड़ी के पुर्नस्थापन में अब तक 5.56 लाख तथा सिविल कार्य में 10.03 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। जनवरी 2010 में आई.आई.टी. कानपुर से मैकेनिकल इंजीनियर अखिलेश अग्रवाल, मर्चेण्ट नेवी में कैप्टन पारितोष चौहान तथा लोक निर्माण विभाग के सेवानिवृत्त प्रमुख अभियन्ता श्रोतिया ने घड़ी की मरम्मत में अपना योगदान दिया है।
योजना की विशेषता यह रही कि घड़ी को मूल डिजाइन के अनुरूप ही सुसज्जित किया गया है। घंटाघर के इतिहास पर नजर डालें तो यह संयुक्त प्रान्त के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गर्वनर सर जार्ज कोपर के सम्मान में 1882 से 1887 के बीच बनवाया गया था। ब्रिटिश आर्किटेक्ट रिचर्ड रासकेल बेयन के नक्शे पर ईंट और चूने से बनी इस इमारत की ऊंचाई 221 फिट है। घंटाघर के निर्माण पर उस समय 90,000 रुपये खर्च हुए थे। घंटाघर में लगी घड़ी ब्रिटेन की फर्म जे.डब्ल्यू बेसन की बनाई तीन विश्व की महान घडिय़ों में से एक है। गन मेटल से बनी यह घड़ी उस समय 26,900 रुपयों में बनकर तैयार हुई थी।
इसमें पांच घंटे लगे हैं। घड़ी 1984 में बंद हो गयी थी जिससे पूर्व यह 1887 से लगातार चल रही थी यानि घड़ी एक शताब्दी तक लगातार चलती रही। कहा जाता है कि उस वक्त एक व्यक्ति को इस कार्य के लिए तैनात किया गया था वह इसकी चाभियां भरता रहे।












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