शिक्षक दिवस: डा. राधाकृष्णन, आचार्य नरेंद्र देव के लिए हमेशा खास थे छात्र
बेंगलुरू। पांच सितम्बर यानी शिक्षक दिवस। इस दिन देश के सभी स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय व संस्थानों में ढेर सारे रंगा-रंग कार्यक्रम होते हैं, लोग अपने शिक्षकों को उपहार भेंट करते हैं।
और तो और पांच सितम्बर की डेट सुनते ही, आपको भी अपने सबसे प्रिय शिक्षक की याद जरूर आ जाती होगी। आखिर इस तिथि में ऐसा क्या है, जो देश भर के लोगों को अपने-अपने शिक्षकों की याद दिला देती है।
यह जादू इस तिथि का नहीं, बल्कि इस दिन पैदा होने वाले डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का है। उन्हीं के जैसे डा. आचार्य नरेंद्र देव जैसे शिक्षकों का है, जो आज भी लोगों के दिलों में है।
आज की पीढ़ी डा. राधाकृष्णन और नरेंद्र देव जैसे शिक्षकों को देख भले ही नहीं सकती, लेकिन उनके बारे में पढ़ने और सुनने से ही आपको उनकी महानता का अहसास जरूर हो जायेगा। डा. राधाकृष्णन का जन्म 1888 में हुआ था। वो हमारे देश के दूसरे राष्ट्रपति (1962–1967) भी थे। मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज से अध्यापन का कार्य शुरू करने वाले राधाकृष्णन आगे चलकर मैसूर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हुए और फिर एक-एक कर कई विश्वविद्यालयों में उन्होंने पढ़ाया। 1939 से लेकर 1948 तक वो बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे।
क्या कहते हैं डा. राधाकृष्णन के छात्र
डा. राधाकृष्णन के व्यक्तित्व की बात करें तो वो 1945 में बीएचयू के छात्र रहे पी रामालिंगम का यह उदाहरण ही काफी है। रामालिंगम बताते हैं कि जब उनका एडमीशन बीएचयू में हुआ, तो वो परिसर खुलने के तीन दिन पहले ही बनारस पहुंच गये। हॉस्टल बंद थे और उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इस अनजान शहर में वो कहां जायें।
एक स्थानीय व्यक्ति की मदद से उन्हें कुलपति से मिलने का मौका मिला। उन्होंने तत्काल हॉस्टल के वॉर्डन को बुलाकर उनके रहने की व्यवस्था की। डा. राधाकृष्णन में खासियत थी कि वो अपने छात्रों को कभी तकलीफ में नहीं देख सकते थे।
एलयू में कोई नहीं हुआ आचार्य जी जैसा वाइस चांसलर
अब अगर आचार्य नरेंद्र देव की बात करें, तो देश में ऐसा कोई भी वाइस चांसलर नहीं हुआ, जिसने छात्रों को रहने के लिए अपना वीसी आवास तक दे दिया। 1947 में जब छात्रों को रहने की दिक्कत हुई और सारे छात्रावासों में जगह भर गई, तो आचार्य जी ने अपने वीसी आवास को छात्रावास में तब्दील कर दिया और खुद एक छोटे से कमरे में रहने लगे।
आचार्य नरेंद्र देव के शिष्य रहे उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के पूर्व संयुक्त निदेशक व समाजवादी चिंतक केसी मिश्र बताते हैं कि आचार्य जी जिस समय वीसी बने, तब लखनऊ विश्वविद्यालय की हालत काफी खराब थी। पांच साल में उन्होंने विश्वविद्यालय में ऐसा कायाकल्प किया, जिसका लोहा लोग आज भी मानते हैं। उनका कार्यकाल पूरा भी नहीं हो पाया था कि उन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय बुला लिया गया। दरअसल उस दौरान डा. अमरनाथ झा के जाने के बाद बीएचयू की हालत काफी खराब हो चुकी थी।
लखनऊ छोड़ते वक्त आचार्य जी के लिये रो रहे थे सैंकड़ों छात्र
खास बात तो यह है कि जिस समय आचार्य जी लखनऊ छोड़ रहे थे, तो उन्हें रोकने के लिए सैंकड़ों छात्र गाड़ी के आगे आ गये थे। तमाम छात्र तो पीछे-पीछे वाराणसी तक पहुंच गये थे। बमुश्किल जब वो वाराणसी पहुंचे तो वहां के छात्र उनके लिए फूल मालायें लिये खड़े थे। उस दिन बीएचयू में दीवाली मनाई गई।
डा. केसी मिश्र बताते हैं कि आचार्य जी अपने छात्रों को हमेशा राजनीति में जाने के लिए प्रेरित करते थे। 1952 में जब लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव हुआ तो उन्होंने सभी राजनीतिक पार्टियों के प्रमुख लोगों को अपने-अपने घोषणा पत्र पर चर्चा करने के लिए बुलाया था।
कांग्रेस की ओर से जवाहरलाल नेहरू और गोविंद वल्लभ भाई पंत आये थे, रिपब्लिकन सोशलिस्ट पार्टी का घोषणा बीआर अम्बेडकर ने पढ़ा था, जयप्रकाश नाराण और अशोक मेहता ने सोशलिस्ट पार्टी का मत रखा, जबकि जनसंघ (जो अब भाजपा है) की विचारधारा डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने रखी। छात्रसंघ के लिए इतना बड़ा आयोजन न तो इससे पहले कभी हुआ और ना ही बाद में।
यदि आप अपने किसी टीचर के बारे में कुछ कहना चाहते हैं, तो लिख भेजिये [email protected] पर। हम आपकी शुभकामनाएं एवं विचार वनइंडिया पर प्रकाशित करेंगे सोमवार 5 सितम्बर को।
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