अन्ना के आंदोलन के साथ बढऩे लगा गांधी टोपी का क्रेज

अन्ना आंदोलन के चलते स्थिति यह है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यालयों के बाहर जहां केवल पार्टी के लिए झंडे व तिरंगे मिलते थे, वहां भी गांधी टोपी और तिरंगा झंडे की बहार आ गयी है। कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी कार्यालय के सामने लगे पार्टी के झंडों और नेताओं की तस्वीर बेचने वाले स्टाल में भी तिरंगा और गांधी टोपी ने जगह बना ली है।
इन स्टालों पर भी गांधी टोपी खूब बिक रही है। राजधानी में गांधी टोपी और तिरंगे की बिक्री के मुख्य केन्द्र गांधी आश्रम में दोनों का स्टाक खत्म है। वहीं गांधी आश्रमों की जो दुकानें सन्नाटे में रहती थी, वहां भी रौनक लौट आयी है। टोपी व तिरंगे के अलावा खादी कुर्तों की भी मांग बढ़ गयी है। मांग बढने के कारण गांधी आश्रमों पर कई दर्जी सिलाई के लिए लगाये गये हैं।
राजधानी लखनऊ में गांधी आश्रम के प्रबन्धक का कहना है कि तिरंगा और गांधी टोपी की बढ़ती मांग को अभी पूरा करना मुश्किल है। स्थिति यह है कि टोपी और तिरंगा बेचने की दुकानें अवकाश के दिन भी खुली रहती है। दिलचस्प बात तो यह है कि दोनों की बढ़ी मांग के बावजूद इसके विक्रेताओं ने इसकी कीमतें नहीं बढ़ाई हैं।
टोपी, कुर्ता व तिरंगा बेचने वालों ने भी अन्ना हजारे को समर्थन देते हुए काफी सस्ते दामों में बेचने का निर्णय लिया है 15 अगस्त को तिरंगे की बिक्री मामूली थी लेकिन 16 अगस्त को अन्ना हजारे के अनशन शुरू करने के बाद इसकी बिक्री में तेजी आ गयी है। राजधानी लखनऊ के मुख्य बाजार हजरतगंज के व्यापारी भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि डेढ़ फिट से दो फिट के झंडे की मांग बढ़ी है। आमतौर पर इसकी बिक्री 15 अगस्त स्वतंत्रता और 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के दिन होती है लेकिन आफ सीजन में ऐसी मांग पहले कभी नहीं देखी गयी।












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