सावन विशेष : सुहाग की निशानी बिछिया..
दोस्तों, हम लगातार आपको महिलाओं के सोलह श्रृंगार के बारे में बता रहे हैं । जानी मानी पत्रिका 'एराउंड द इंडिया' के मई अंक में छपे लेख सोलह 'श्रृंगार की महत्ता' की लेखिका 'कुमद मेहरोत्रा' ने इस विषय पर गहन अध्ययन किया है, जिसके बाद उन्होंने अपनी लेखनी से श्रृंगार का महत्व समझाया है।
कल हमने आपको श्रृंगार नंबर14 यानी 'पाजेब' के बारे में तो आज हम आपको बताते हैं श्रृंगार नंबर 15 के बारे में। जिसे हम बिछिया भी कहते हैं। पांवो में अंतिम आभूषण के रूप में बिछिया पहनी जाती है। दोनों पांवों की बीच की तीन उंगलियो में बिछिया पहनने का रिवाज है। वास्तव में सारे श्रृंगार बिछिया और टीका के बीच होते हैं।
सोने का टीका और चांदी की बिछिया का भाव ये होता है कि आत्म कारक सूर्य और मन कारण चंद्रमा दोनों की कृपा जीवनभर निरन्तर बनी रहे। बिछिया एक्यूप्रेशर का भी काम करती है। जिससे तलवे से लेकर नाभि तक की सभी नाड़िया और पेशियां व्यवस्थित होती हैं। भारत में शहरी क्षेत्र में इसका चलन बहुत कम हो गया है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इसकी महत्ता बरकरार है।













Click it and Unblock the Notifications