सरकारी लोकपाल बिल के राह में रोड़ा बनेगी भाजपा

लोकपाल बिल में प्रधानमंत्री के पद, सांसदों और न्यायापालिका के मुद्दे पर भाजपा ने अपना अलग रास्ता चुना है। गुरुवार को लोकसभा में विधेयक पेश किए जाने से पहले नेता विपक्ष सुषमा स्वराज ने विरोध जताते हुए कहा कि संविधान में सबको समान अधिकार दिया गया है। भारतीय दंड संहिता में भी किसी को छूट नहीं दी गई है, लेकिन लोकपाल में पीएम को दायरे से बाहर कर दिया गया है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में आए लोकपाल विधेयक में प्रधानमंत्री को भी शामिल किए जाने का हवाला देते हुए उन्होंने आग्रह किया कि मौजूदा विधेयक को भी उसी अनुरूप बनाया जाए। बाद में राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने भी सुषमा की मांग को सही ठहराया औऱ सशक्त लोकपाल की मांग की। वैसे विधेयक पेश करने वाले केंद्रीय राज्य मंत्री वी. नारायणसामी ने उनके तर्क को खारिज किया और कहा कि कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब संसद में इसका प्रारूप तय होगा।
वहीं प्रणब मुखर्जी ने भाजपा को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की और याद दिलाया कि राजग सरकार में लोकपाल विधेयक को पारित करवाने की कोशिश क्यों नहीं की गई? संसद के बाहर मौजूदा विधेयक का विरोध कर रही टीम अन्ना को भी प्रणब ने संसद के अंदर से ही संकेत दे दिया। उन्होंने परोक्ष रूप से टीम अन्ना की ओर इशारा करते हुए पूछा, 'क्या उनका दिया विधेयक यहां पारित कर देंगे?' इस पर लगभग एक स्वर में सांसदों ने 'नहीं' कहा। इससे तो यह तय हो गया है कि अन्ना जब 16 अगस्त से अनशन करेंगे तो उन्हें भी समर्थन देने वाले दलों में सिर्फ भाजपा ही रहेगी।












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