5 दोस्त, 5000 फीट और मौत से जंग

मै आज आपको अपनी हाल ही की जिंदगी में महसूस किये एक भयानक और रोमांचकारी अनुभव के बारें में बताना चाहूंगा। यह पांच लोगों की कहानी है। इसमें सभी लोगों की सोच अलग है और साथ ही साथ भाषा भी कुछ हद तक अलग हैं। हम पांचों एक ही ऑफिस में काम करते हैं और एक बार जरा सी अनजानी गलती के चलते हम पांचों ने अपनी जिंदगी को खतरें में डाल दिया। हमने पहली बार मौत के डर को महसूस किया। डर भी ऐसा जिससे बाहर निकलने के बाद भी सोचा जाये तो डर लगने लगता है। तो आईऐ हम बताते हैं खुद पर बीती मौत के उस डर को।
मै अपने मूल निवास स्थान यूपी से लगभग 2,500 किलोमीटर दूर यानी कि बैंगलूरू में रहकर एक निजी संस्थान में काम करता हू। अभी कुछ दिनों पहले यानी कि 23 जुलाई 2011 की ही बात है। मै और कार्यालय में मेंरे साथ काम करने वाले अन्य चार लोगों ने बैगलूरू से लगभग 82 किलोमीटर दूर स्थित चिंतामणी घूमने जाने की योजना बनायी।
इस योजना का सूत्रधार साथ में ही काम करने वाला एक मित्र प्रशांत था। वह चिंतामणी का ही रहने वाला है। योजना बनी और हम अगले दिन शाम को जल्दी ही ऑफिस में आपना काम खत्म करके चिंतामणी के रोमांचकारी यात्रा के लिए निकल पड़े। इस यात्रा में मै, राघव, शंकर, प्रशांत, और रंजन सहित कुल पांच लोग शामिल थे। इस यात्रा का हम सभी में उत्साह था, लेकिन मैं कुछ ज्यादा ही उत्साहित था।
मैं हमेशा से पहाड़ों को सोचकर रोमांच से भर जाता था। इस बार मेरे पास पहाड़ों पर चढ़ने का मौका भी था तो भला मै कैसे चुकने वाला था। हम सभी रात में चिंतामणी पहुच गये। मेरे उस मित्र का घर खाली था, तो हमने बाहर से ही खाने-पीने के सामान लिए और उसके घर पर पहुंच गये। रात में कुछ देर तक कल की योजनाएं बनी और जरूरी सामानों को एक बैग में रख लिया गया। इस दौरान यह भी तय हुआ कि केवल एक ही बैग लेकर जाया जायेगा जिससे की चढाई में कोई समस्या न हो।
आखिरकार रात बीती और अगले दिन (25 जुलाई) की सुबह आयी और हम सभी जल्द से जल्द नहा धोकर तैयार हो गये। एक छोटे से बैग में पानी को दो बोतलें और खाने पीने का सामन रखकर निकल पड़े एक रोमांचकारी यात्रा के लिए। सुबह करीब 9 बजकर 15 मिनट पर हम घर से निकले और बस द्वारा हम कोनापल्ली पहुंच गये। उसके बाद हमने अपने सामने एक शानदार और विशाल पहाड़ जिसे अम्बा जी दुर्गा के नाम से जाना जाता है उसे सीने फैलाए देखा।
हम लोग बगैर देर किये पहाड़ी की तरफ बढने लगे। पहाड़ी पर चढ़ते समय प्रशांत जो कि एक बार और इस पहाड़ी पर आ चुका था वो हम सभी से आगे आगे चल रहा था। प्रशांत एक गाइड की तरह हम लोगों को रास्ते में मिलने वाले, फूल पौधों और जानवरों के बारें में बताता जा रहा था। कुछ देर बाद मै थकने लगा, चूकि में उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाके का रहने वाला था तो मुझे पहाड़ों पर चढने का कोई अनुभव नहीं था।
लगभग 1 घंटे सीधी चढ़ाई करने के बाद हम रूके और साथ में लाए बॉटल से पानी पिया और एक चट्टान पर बैठकर कुछ देर आराम किया। चुकि हमारे पास पानी कम था और सभी लोग चढाई के बाद प्यासे हो गये थे इसलिए जल्द ही हमारे बोतल का पानी खत्म हो गया। धीमे-धीमेचढतें हुए हम सभी को काफी थकान हो गयी थी। कुछ देर बाद जब हम जमीन से लगभग 4,000 फीट की उंचाई पर पहुंचे तो हमने अपने सामने उस पहाड़ी का सबसे उंचा चट्टान अपने सामने देखा जो कि एक चुनौती के समान हमारें सामने खड़ा था।
हिम्मत बांधकर हम उपर चढने लगे और आखिरकार लगभग डेढ़ बजे हम पहाड़ी के उपर पहुंच गये और पहाड़ी पर फतह हासिल कर ली। उस समय वहां का वातावरण में एक अजीब सा अनुभव था हमारे उपर खुला आकाश और कदमों में सारी दुनिया थी। उस जगह सें हम कर्नाटक के ज्यादा से ज्यादा भूभाग को देख सकते थे। वहां पहुच कर हमने एक छोटे से भगवान शंकर के मदिर का दर्शन किया और पास में ही लगभग 300 साल पुराना एक कुआं मिला। उस कुंए के बारें में प्रशांत को पहले से पता था, हमने वहां से पानी पिया और साथ में लाये बिस्किट इत्यादी खाने के बाद कुछ देर आराम किया।
लगभग 2 बजे से हमने पहाड़ी के दूसरी तरफ से नीचे उतरना शुरू किया और यहीं से शुरू हुआ इस यात्रा का रोमांच। अभी हम मंदिर से लगभग 50 कदम ही निचें आयें थे कि राघव जो कि सबसे आगे चल रहा था, वो चीख पडा। हम सब दौड़कर उसकी तरफ बढे़ तो उसके आगे का मंजर देख सभी के होश उड़ गये। हम सभी जिस तरफ बढ रहे थे वो पहाड़ी वही खत्म हो गयी थी उसके आगे काल के गाल की तरह मौत की खाई हमारे स्वागत के लिए मु़ह खोले खड़ी थी।
हम सभी सकते में थे। सबने प्रशांत की तरफ एक आशा भरी नजरों से देखा जो खुद घबरातें हुए बड़बडाने लगा कि अभी पिछली बार जब मै आया था तो इसी रास्तें से नीचें उतरा था। फिर हम सभी ने हिम्मत बांधकर नीचें उतरने की कोशिश की और एक बार फिर, हम सभी डर गये हमारे कदमों के नीचे एकदम सीधी (नीचे की तरफ) चट्टान थी, और हमारे पास सहारे के नाम पर बस अपने दो पैर और दो हाथ थे। वहां कोई रस्सी नहीं थी, था तो सिर्फ चट्टान जिसे हम सहारा भी नहीं बना सकते थे।
इसी बीच शंकर जो शरीर में काफी दुबला था, उसने आगे बढकर एक रास्ता ढूढा जो कि काफी खतरनाक था। सीधी चट्टान पर अपने पैरों से ग्रीप बना कर हमें आगे बढना था। मतलब जरा सा भी चूक होती तो हमारें बाएं तरफ लगभग 5,000 फिट खाई थी जो कि शायद हमें जिंदा निगल जाती। हम सभी शंकर के पीछे-पीछे चलने लगें इस दौरान मुझे सबसे ज्यादा डर लग रहा था, क्योकि मेरा वजन काफी ज्यादा था और मेरे पीठ पर बैग भी था। मैं जैसे ही आगे बढा तो मुझे लगा कि मेरा पैर फिसल जायेगा।
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उस समय मैने बगल में खाई देखी तो मेरे होश फाख्ता हो गये। मैने खुद को पीछे खिंचा और संभलने की कोशिश की। इस दौरान मेरे हाथ और पांव दोनों कांप रहें थे। डर के इस तूफान के कारण मेरे होंठों से अनायास ही शब्दो की एक धारा फूट पड़ी और मै चिल्लाने लगा, आई कान्ट, आई कान्ट, मै नीचें नहीं उतर सकता। तभी निचे पहुच चुके प्रशांत और बाकी के साथी मुझे हौसला देने लगे और प्रशांत मेरी मदद के लिए आगे बढने लगा। उस समय मैने महसूस किया कि मौत जब सामने हो तो आप लाचार हो जातें है लेकिन तभी मेरे ठीक पीछे मौजूद रंजन ने मेरा हाथ पकडा और हौसले के साथ नीचे उतरने को कहा।
मै धीमे-धीमें नीचे आने लगा और भगवान को याद किया फिर मन में सोचा हे भगवान इस बार नीचें उतार दो दोबारा जिंदमी में ऐसी गलती कभी नहीं करूंगा। आखिरकार भगवान ने मेरी सुनी और मै निचे उतरने लगा तभी मेरा पैर फिसल गया और दाहिनी तरफ एक झाड़ी में गिर गया। गिरतें समय मेंरी आखें बंद हो गयी थी और हाथ एक कैकटस के पौधे को तेजी से पकड़े हुए थे।
मेरे हाथों से खून निकल रहा था, लेकिन दिमाग पर डर इतना हावी था कि मै कैक्टस का सहारा लेकर ही खड़ा हुआ और भूल गया कि मेरे हाथों से खून निकल रहा हैं। मेरे अन्य साथी दौड़कर मेरे पास आ चुके थे और उन्होने मुझे सहारा देकर उस झाड़ी से निकाला। वहां से हटते समय मैने चोर नजरों से अपने ठीक बाएं तरफ खाई को देखा जो मुझे एक चुडैल की तरह मुंह चिढा रही थी।
उस समय राघव ने कहा कि हमें इस रास्तें को छोड़कर वापस पिछे के रास्ते से चलना चाहिए, लेकिन हम सभी जानतें थे कि जिन मुश्किलों से हम इतना नीचें आये है दोबारा उन पत्थरों पर कदम रखना बहुत मुश्किल होगा। धीमें-धीमे समय बीत रहा था। मेरे दिमाग में मेरें घर वालों की तस्वीरें घूमने लगी थी, मैने अपनी इस यात्रा के बारें में घर पर किसी को नहीं बताया था और मुझे डर था कि यदि मै इन पत्थरों के बीच मर गया तो 2,500 किलोमीटर दूर मेरी मां शायद मेरी लाश को भी नहीं देख पायेगी।
इतना सोचते ही मै तेज कदमों से आगे बढने लगा, सभी मेरे साहस को देखकर अवाक थे। लेकिन मेरे दिमाग में क्या चल रहा था, इसका मुझे भी आभास नहीं था। मेरा अपने पैरो पर कोई भी नियंत्रण नहीं था। शायद यही वो समय होता है जब आप मौत को सामने पातें है तो आपमें शोलों पर नंगे पांव दौड़ने की हिम्मत आ जाती हैं। मेरे साथियों ने मुझे पुकारा लेकिन मै बस चट्टानो और झांडियों में घुस कर निकलता जा रहा था।
कुछ देर बाद मैने देखा तो वो भी मेरे पिछे आ रहे थे। इसी दौरान राघव मेरे पिछे आ गया लेकिन रंजन जो कि अभी काफी पिछे एक चट्टान पर जिंदगी और मौत के बीच फंसा था। रंजन के मुह से आवाज तक नहीं आ रही थी। उसके आंखों में आंसू थे और वो मुर्दे की तरह चट्टान पर पड़ा था। फिर हमने एक बार हिम्मत की और उसके पास पहुचे और उसे किसी तरह नीचें उतारा।
कुछ देर चलने के बाद हम सभी को अपनी मंजिल दिखने लगी थी। धीमे-धीमें मुश्किलें हमारें पीछे हो रही थी। लगभग 4 बजें हम चट्टानों को पार कर नीचें समतल पर आ गये। सभी के चेहरों पर खौफ साफ दिख रहा था। शरीर मानों टूट कर बिखरने को तैयार था। उस समय मेरे दिमाग में एक बहुचचर्चित कहावत कौंध रही थी कि "डर के आगे जीत है"
मैने अपनी जिंदगी में कभी भी मौत को अपने इतने पास से नहीं देखा था। नीचे आने के बाद हममें से किसी ने कहां कि यदि हम नीचे न आ पाते तो क्या होता? तो किसी ने जवाब दिया कि पुलिस या रेसक्यू टीम को बुलाया जाता। इसी समय राघव ने कहा वो भी वैसे ही हमारी मदद करतें जैसे हमने खुद की मदद की। वाकई उसने सहीं कहा था। जब आप समस्याओं से घिरे हो तो हिम्मत जुटाइए और डर पर फतह करीये।












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