आबादी की ओर हो सकता है गंगा का बहाव

वन विभाग के कछुआ अभयारण्य के चलते गंगा के उस पार बालू खनन पर रोक लगा दी गयी थी लेकिन आज इसी रोक के दुष्परिणाम देखने को मिल रहे हैं। नदी में बालू के बड़े-बड़े टीले उभर आये हैं। बालू के टीलों के चलते गंगा का बहाव शहर की आबादी की तरफ हो रहा है। जानकारी मानते हैं कि यदि कछुआ अभयारण्य को समाप्त कर बालू के टीलों को व्यवस्थित करने की योजना नहीं बनायी गयी तो गंगा नया रास्त बना लेगी जो काशी से होकर गुजरेगा।
घाट के किनारे बने भवनों में पड़ती दरारें और धंसती सीढिय़ां यह बता रही हैं कि यदि समय रहते इस ओर ध्यान न दिया गया तो इसके भयंकर नतीजे देखने को मिलेंगे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में गंगा शोध केन्द्र के संस्थापक प्रो. यू.के. चौधरी के अनुसार गंगा में खनन न किए जाने से बाबू एक ही स्थान पर एकत्र होकर टीले का रूप ले रही है जो काफी खतरनाक है। गंगा की राह में खड़े यह टीले गंगा के बहाव को बदल सकते हैं।
यदि यह बहाव आबादी की ओर हुआ तो भयंकर तबाही होगी। गंगा में बालू का स्तर बढऩे से पानी भी ऊपर-ऊपर की ओर बह रहा है जो किनारे की मिट्टी को धीरे-धीरे कमजोर करता जा रहा है। जानकारों का मानना है कि गंगा के बहाव क्षेत्र में बालू का टीला जितना ऊंचा होगा उसके ठीक सामने के घाट की तलहटी उसी अनुपात में खोखली होती जायेगी।
कहा जाता है कि जब भी नदी अपर स्ट्रीम से डाउन स्ट्रीम की तरफ जाती है तो घाटों से पानी के टकराने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। नदी के जल में तीव्र प्रक्रिया होती है जिससे सामने व किनारे की मिटटी का क्षरण होता चला जाता है। लाख प्रयास के बाद भी इस क्षरण को रोका नहीं जा सकता है। वन विभाग को इन बातों से आगाह कर दिया गया है लेकिन अभी तक उनकी ओर से कोई सक्रिय कदम नहीं उठाया गया लोगों को डर हैं कि यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो कर्ई लोगों की जान पर बन सकती है।
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