मोदी सरकार ने माना कि गोधरा कांड के अहम सुराग जला दिये गये

आपको मालूम होगा कि गुजरात की मोदी सरकार दंगों में अपनी भूमिका हमेशा से साफ-सुथरी बताती रही है। मगर दंगों की जांच कर रहे नानावटी आयोग के सामने मोदी सरकार का यह ताजा बयान उनकी मंशा पर कई सवाल खड़ा कर रहा है। गौरतलब है कि मोदी सरकार ने नानावटी कमीशन को बताया कि वो 2002 दंगों से जुड़े जरूरी दस्तावेज नष्ट कर चुकी है। कमीशन के सामने सरकारी वकील एसबी वकील के मुताबिक इनकमिंग और आउटगोइंग कॉल डेटा, सरकारी वाहनों का हिसाब रखने वाली लॉग रजिस्टर बुक्स, अफसरों की आवाजाही की सरकारी डायरियां 2007 में ही नष्ट कर दिए गए थे।
वकील के मुताबिक आईपीएस अफसर संजीव भट्ट नरेंद्र मोदी की बुलाई मीटिंग में अपनी मौजूदगी के बारे में झूठ बोल रहे हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि इसका सरकारी रिकॉर्ड मौजूद ही नहीं है। एसबी वकील की मानें तो इस बात को समझने की जरूरत वास्तव में संजीव भट्ट को कॉल की गई थी या वो मीटिंग में गए भी थे या नहीं। ये रिकॉर्ड तो 2007 में ही नष्ट हो गए थे।
वहीं, सांप्रदायिक दंगों के केसों से जुड़े लोग सरकार के इस बयान के बाद ताज्जुब में हैं। मुकुल सिन्हा (वकील, जनसंघर्ष मंच) ने बताया कि सभी अहम केसों में कार्यवाही, नरोदा ग्राम केस, जकिया जाफरी की मुख्य शिकायत और दूसरे केस अभी तक चल रहे हैं। ऐसे में साक्ष्यों को नष्ट करना न केवल ताज्जुब पैदा करता है बल्कि ये गैरकानूनी भी है।
अब सवाल यह उठता है कि जिन दस्तावेजों को संज्ञान में लेते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को 2002 के दंगों में संलिप्त माना जा रहा था उन दस्तावेजों के नष्ट होने के बाद इस पूरे मामले का क्या होगा। जिन लोगों का यह मानना था कि 2002 के दंगों में नरेन्द्र मोदी दोषी है और उनके सजा होनी चाहिए तो उन लोगों के लिये यह बयान झटका देने वाला होगा। क्योंकि अब अगर उन बयानों में थोड़ी भी सच्चाई हुई तो मोदी को दोषी करार देना बेहद ही कठीन होगा।












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