राम बिन मुद्दा विहीन हुई भाजपा

चाहे विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा। अन्य दल जहां महंगाई व अन्य मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाते रहे हैं वहीं भाजपा ने राममंदिर के सहारे काफी राजनीति की। देश की राजगद्दी भी उसने इसी दम पर हासिल की। अब इस मुद्दे में कोई दम रहा नहीं और राममंदिर मुद्दा कोर्ट के हवाले हो गया। ऐसे में भाजपा भ्रष्टाचार को नाहक मुद्दा बनाने की कोशिश में है। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेडऩे का एलान किया है।
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि भ्रष्टाचार को मुद्दा आम जनता को अधिक नहीं भाता क्योंकि भ्रष्टाचार के सभी राजनैतिक दलों में भरा पड़ा है। अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ लामबंद होने के बाद सभी राजनीति पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ आग उगल रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी से कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह यह पूछ ही लिया कि उनके पास अकूत सम्पत्ति कहां से आयी। ऐसे में जब सभी राजनीति दल एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के कीचड़ उछाल रहे हैं तो इसे मुद्दा बनाकर जनता के बीच नहीं जाया जा सकता।
पिछले चुनाव में तीसरे नम्बर पर आने के बाद भाजपा को लगा प्रदेश उसके हाथ से सरक गया है। पार्टी में संगठनात्मक फेरबदल कर दिए गए। राष्ट्रीय स्तर पर जहां नितिन गडकरी को लाया गया वहीं प्रदेश की कमान सूर्य प्रताप शाही को सौंपी गयी। बावजूद इसके भाजपा अंदरूनी कलह को दूर नहीं कर सकी।
पूर्व में भाजपा के साथ रहे कल्याण सिंह के तेवर भी बागी हो चले हैं। वह भाजपा को नुकसान पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चुनावी मैदान में आ डटे हैं। कल्याण के जाने के बाद लोधी वोट बैंक को बटोरने के लिए भाजपा उमा भारती की घर वापसी जरूरी मान रही है। उमा के वापसी की बात पिछले चुनाव में भी उठ चुकी है लेकिन पार्टी में एक राय नहीं बन सकी। अब जबकि कल्याण नहीं है तो लोधी वोट बैंक के लिए उमा ही एकमात्र जरिया है।












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