ओसामा के ख़िलाफ़ कार्रवाई: कब कैसे हुआ?

अमरीका में 9/11 के हमलों के कई साल पहले से ही अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने ओसामा बिन लादेन से जुड़े लोगों का ब्यौरा इकट्ठा करना शुरु कर दिया था. लेकिन वर्ष 2002 में जाकर ऐसा हुआ कि सीआईए ने अल क़ायदा के लोगों को पकड़ना शुरु किया, ख़ासकर वो जिन पर ओसामा निर्भर रहते हों. अमरीकी हिरासत में क़ैदियों ने एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताया जिस पर ओसामा भरोसा करते थे और जो उनका संदेशवाहक था.
उस व्यक्ति के बारे में न्यूयॉर्क हमले के मुख्य साज़िशकर्ता ख़ालिद शेख मोहम्मद और अल क़ायदा के बड़े नेता अबू फ़राज अल लीबी को भी बताया गया. लेकिन दोनों ने कह दिया कि वे उस व्यक्ति को नहीं जानते. इससे जाँचकर्ताओं को और शक हो गया कि ये 'संदेशवाहक" कोई ख़ास आदमी है. वर्ष 2005 तक सीआईए में बहुत सारे लोगों को लगने लगा कि ओसामा को ढूँढने का अभियान ठंडा पड़ गया है. नतीजन ऑपरेशन कैननबॉल शुरु हुआ जिसके बाद अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में सीआईए के ज़्यादा अफ़सर तैनात किए गए.
जल्द ही सीआईए को उस संदेशवाहक के परिवार का नाम पता चल गया. इसके बाद अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी ने परिवारवालों और किसी भी पाकिस्तानी के बीच ईमेल और फ़ोन कॉल पर नज़र रखनी शुरु कर दी. यहीं से ओसामा के भरोसेमंद माने जाने वाले संदेशवाहक व्यक्ति के पूरे नाम का पता चला.
1. वर्ष 2010 को जुलाई में सीआईए के लिए काम करने वाले कुछ पाकिस्तानियों ने इसी संदेशवाहक व्यक्ति को पेशावर में कार चलाते हुए देखा. कई हफ़्तों तक नज़र रखी गई. वो व्यक्ति पाकिस्तान में जहाँ जहाँ गया सीआईए ने उसका पीछा गया. अमरीकी अधिकारियों का कहना है कि वो व्यक्ति उन्हें इस्लामाबाद से 35 मील दूर ऐबटाबाद में एक बड़ी इमारत तक ले गया. अमरीकी ख़ुफ़िया अधिकारियों को तब लगा कि कोई बड़ी जानकारी उनके हाथ लगी है, शायद ओसामा का पता चल गया हो. ये कोई गुफ़ा नहीं बल्कि आलीशान इमारत थी.
2. उधर वाशिंगटन में सीआईए निदेशक लिओन पनेटा ने राष्ट्रपति ओबामा, जो बाइडन, विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन, रॉबर्ट गेट्स और अन्य अधिकारियों से मुलाक़ात की. ये बैठक इतनी गोपनीय थी कि एक दूसरे को भेजे संदेशों में किसी ने बैठक का विषय तक नहीं लिखा. पनेटा ने विस्तार से ओसामा बिन लादेन और उनके छिपने की संभावित जगह के बारे में जानकारी दी. आगे क्या करना है कि इसे लेकर माहौल काफ़ी तनावपूर्ण था और कई बैठकें भी हुईं.
3. लिओन पनेटा का सुझाव था कि लादेन की मौजूदगी की पुष्टि करने के लिए आक्रामक रणनीति की ज़रूरत है. जबकि कुछ खुफ़िया अधिकारी चिंतित थे कि अगर ऐबटाबाद में इमारत के सुरक्षाकर्मियों को शक हो गया कि कोई उन पर नज़र रखे हुए है तो वे ओसामा को वहाँ से निकाल सकते हैं. कई हफ़्तों तक उपग्रहों के ज़रिए कई तस्वीरें ली गईं और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी ने वहाँ से आने वाली हर सूचना पर नज़र रखी. ये आसान नहीं था क्योंकि वहाँ फ़ोन लाइन और इंटरनेट नहीं था.
1. फ़रवरी 2011 में लिओन पनेटा वाइस एडमिरल विलियम एच मैकरेवन से मिले. वे एक सीआईए अभियान में पेंटागन के ज्वाइंट स्पेशल ऑपरेशन्स कमांड के कमांडर थे. उनके साथ मिलकर हमले की योजना तैयार करने का काम शुरु हुआ.
2. एडमिरल मैकरेवन ने तीन विकल्पों का सुझाव दिया- या तो अमरीकी कमांडो का इस्तेमाल कर हेलीकॉप्टर अभियान चलाया जाए, या बी-2 बॉम्बरों का इस्तेमाल किया जाए जिससे इमरात ही नष्ट हो जाए.
3. पाकिस्तान के साथ मिलकर अभियान चलाया जाए लेकिन पाकिस्तान को कुछ घंटे पहले ही इस बारे में बताया जाएगा. चौदह मार्च 2011 को सीआईए के प्रमुख पनेटा तीनों सुझाव लेकर व्हाइट हाउस गए. तब तक इस बात के सबूत मिलने लगे थे कि लादेन पाकिस्तान में हैं. लेकिन मार्च में अमरीका और पाकिस्तान के रिश्ते काफ़ी तनावपूर्ण चल रहे थे क्योंकि अमरीकी नागिरक रेमंड डेविस को पाकिस्तान ने गिरफ़्तार किया हुआ था. ओबामा के कुछ सहयोगियों को डर था कि अगर लादेन को पकड़ने के लिए कोई अभियान चलाया जाता है तो पाकिस्तान सरकार नाराज़ हो सकती है और रेमंड डेविस को अपनी जान गंवानी पड़ सकती है. लेकिन 16 मार्च को डेविस को रिहा कर दिया गया जिसके बाद अमरीका का रास्ता आसान हो गया.
बाईस मार्च 2011 को राष्ट्रपति ओबामा ने अपने सलाहकारों से पूछा कि तीनों विकल्पों के बारे में उनकी क्या राय है. रॉबर्ट गेट्स हेलीकॉप्टर हमले को लेकर संशंकित थे और उन्होंने कहा कि स्मार्ट बम का इस्तेमाल कर हवाई बमबारी के बारे में सोचा जाना चाहिए. लेकिन कुछ दिनों बाद अधिकारियों ने बताया कि इसके लिए दो हज़ार पाउंड के 32 बम लगेंगे. इससे इमारत तो नष्ट हो जाएगी और वहाँ एक बड़ा गड्ढा बन जाएगा लेकिन फिर ये कैसे सुनिश्चित होगा कि लादेन मारे गए हैं या नहीं.
विचार विमर्श के बाद हेलीकॉप्टर अभियान पर सहमति बनती दिखी. 'नेवी सील्स' की जिस टीम को ये काम करना था उसने अमरीका में अभ्यास करना शुरु कर दिया. हालांकि उन्हें बहुत बाद में बताया गया कि असल निशाना क्या होगा.
अमरीका में गुरुवार 28 अप्रैल के दिन ओबामा ने उच्च अधिकारियों से मुलाक़ात की. (एक दिन पहले ही ओबामा ने अपना जन्म प्रमाण पत्र जारी किया था और इस विवाद पर नाराज़गी जताते हुए कहा था कि देश के सामने बहुत सारे अहम काम हैं.) बैठक में लिओन पनेटा ने बताया कि सीआईए ने अपनी ख़ुफ़िया जानकारी कुछ अन्य विशेषज्ञों से बाँटी है जो इस अभियान से जुड़े नहीं थे.
मक़सद ये जानना था कि क्या ये विशेषज्ञ भी मानते हैं कि लादेन ऐबटाबाद में है. विशेषज्ञ इस बात से सहमत थे. यानी फ़ैसला लेने की घड़ी आ गई थी. बैठक में बार-बार नकारात्मक नतीजों के बारे में चर्चा हुई. एक अधिकारी के मुताबिक लंबे समय तक एकदम सन्नाटा था. आख़िरकर ओबामा बोले, “मैं आपको अभी अपना फ़ैसला नहीं बताऊँगा. मैं वापस जाऊँगा और कुछ देर और सोचूँगा, लेकिन जल्द ही अपना फैसला दूँगा."
इसके 16 घंटे बाद ओबामा ने अंतत फ़ैसला लिया. सुबह सुबह चार उच्च अधिकारियों को बुलाया गया. इससे पहले वो कुछ बोलते ओबामा ने कहा, "इट्स ए गो" यानी हाँ है. जल्द से जल्द अभियान शनिवार, 30 अप्रैल को किया जा सकता था लेकिन अधिकारियों ने आगाह किया कि उस दिन बादल छा सकते हैं और रविवार का दिन तय किया गया. रविवार, एक मई को अधिकारियों ने व्हाइट हाउस के कुछ हिस्सों में पर्यटकों का दौरा रद्द कर दिया. उन्हें डर था कि ग़लती से पर्यटक उच्च सुरक्षा अधिकारियों से आते-जाते टकरा सकते हैं जो पनेटा द्वारा भेजी जा रही जानकारी पर नज़र रखे हुए थे.
एक मई को दोपहर स्थानीय समयानुसार दो बजकर पांच मिनट पर पनेटा ने अंतिम बार अभियान की जानकारी दी. एक घंटे बाद लैंगली से उन्होंने बताया, “वे पाकिस्तान में प्रवेश कर चुके हैं."
अमरीका की कमांडो टीम ने अफ़ग़ानिस्तान सीमा में जलालाबाद से पाकिस्तान में प्रवेश किया. मक़सद ये था कि इससे पहले कि पाकिस्तान को पता चले कि किसी ने उसकी सीमा में प्रवेश किया है, वहाँ अभियान समाप्त कर निकल जाया जाए.
पाकिस्तान में आधी रात से ज़्यादा बीत चुकी थी और सोमवार सुबह होने वाली थी. जैसे ही हैलीकॉप्टर नीचे उतरने लगे, ऐबटाबाद में इमरात के पास रहने वाले लोगों को ज़ोर का धमाका और गोलीबारी सुनाई दी. नेवी सील्स टीम ने इमारत में प्रवेश किया और गोलीबारी होने लगी.
अंदर मौजूद एक व्यक्ति ने एक महिला को ढाल बना लिया और अमरीकियों पर गोली चलाने लगा. दोनों लोग मारे गए. दो और लोग मारे गए. बाद में अमरीका को पता चला कि मारे गए लोगों में से एक लादेन का बेटा हमज़ा था और एक ओसामा का संदेशवाहक था. अमरीकी अधिकारियों का कहना है कि अगर ओसामा बिन लादेन ने विरोध न किया होता तो वे उन्हें हिरासत में ले लेते. बाद में लादेन की एक पत्नी ने उनके शव की पहचान की.
सील्स कमांडो ने ओसामा की तस्वीर ली और चेहरे को पहचानने वाले सॉफ्टवेयर के ज़रिए कहा कि ये व्यक्ति 95 फ़ीसदी ओसामा है. बाद में डीएनए टेस्ट से पता चला कि 99.9 फ़ीसदी ये व्यक्ति ओसामा ही है. इस बीच अमरीका को एक और समस्या का सामना करना पड़ रहा था. उनका एक हेलीकॉप्टर काम नहीं कर रहा था. ये हेलीकॉप्टर ग़लत लोगों के हाथ न लग जाए, इसलिए अमरीकी कमांडरों ने महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित इकट्ठा कर हेलीकॉप्टर को उड़ा दिया.
उस समय तक पाकिस्तानी सेना अपनी सीमा में घुसपैठ को देखते हुए अपने सैनिक इकट्ठा करने लगी थी. अमरीका ने बाद में कहा कि अच्छा हुआ कि पाकिस्तानी सेना के साथ कोई सामना नहीं हुआ. पाकिस्तानी समय रात को एक बजकर दस मिनट पर निकलने से पहले अमरीकी कमांडर अपने साथ इमारत से बरामद कई दस्तावेज़ और कंप्यूटर का हार्ड ड्राइव ले आए.
ओबामा प्रशासन पहले ही तय कर चुका था कि मुसलमानों की भावनाएँ आहत न हों इसलिए ओसामा को 24 घंटों के अंदर दफ़नाए जाने की प्रक्रिया का पालन किया जाएगा. अंतत तय हुआ कि ओसामा को समुद्र में दफ़नाया जाए क्योंकि कोई देश शव लेने के लिए तैयार नहीं होगा. अमरीका वैसे भी ओसामा के लिए कोई कब्र नहीं बनने देना चाहता था, जहाँ लोगों को इकट्ठा होने का मौक़ा मिले.
पेंटागन अधिकारी के मुताबिक ओसामा बिन लादेन के शव को नहलाया गया और कफ़न में लपेटा गया. एक एयरक्राफ़्ट में शव को एक बैग में रखा गया, जो काफ़ी वज़नी था. एक अधिकारी ने धार्मिक पाठ किया जिसका एक व्यक्ति ने अरबी में अनुवाद किया. इसके बाद ओसामा बिन लादेन के शव को समुद्र में डाल दिया गया. एयरक्राफ़ट में मौजूद बहुत कम लोगों ने ये अंतिम दृश्य देखा.












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