नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री कृष्ण प्रसाद भट्टाराई का निधन

नेपाल में भट्टराई 'संत प्रधानमंत्री' भी कहे जाते थे। भट्टाराई का भारत से एक अटूट नाता है। भट्टराई का जन्म बिहार के रामनगर गांव में हुआ था। उनके पिता के परिवार को नेपाल के राणा प्रधानमंत्रियों ने निर्वासित कर दिया था। भट्टाराई ने वर्ष 1942 में 'भारत छोड़ो' आंदोलन में हिस्सा लिया। उस समय वह 18 वर्ष के थे। आंदोलन के दौरान वह कई बार जेल भी गए। भट्टराई ने नेपाल में लोकतंत्र को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
भारत में आजादी के आंदोलन से प्रभावित भट्टाराई और नेपाल से निर्वासित किए गए अन्य लोगों को भी नेपाल में राजशाही खत्म करके लोकतंत्र स्थापित करने की उम्मीद जगी। नेपाल में लोक तंत्र स्थापित करने के लिए उन्होने वर्ष 1950 में कोलकाता में निर्वासित नेपाली कांग्रेस की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य नेपाल में सशस्त्र संघर्ष शुरू करना था।
गांधीवादी भट्टाराई उस समय दक्षिणी नेपाल में सशस्त्र विद्रोह का हिस्सा बने। नेपाल लौटने पर उन्हें 14 साल के लिए जेल भेज दिया गया जहां शुरुआती आठ साल उन्होंने बिना किसी मुकदमे के काटे। भट्टाराई और उनके सहयोगियों के लोकतंत्र समर्थक आंदोलन को पहली सफलता 1990 में मिली जब राजनीतिक पार्टियों से प्रतिबंध हटा लिया गया। बाद में भट्टाराई प्रधानमंत्री बने और उन्होंने स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए बनी अंतरिम सरकार का नेतृत्व किया।
बाद में पार्टी की आंतरिक राजनीति और गिरिजा प्रसाद कोइराला की महत्वाकांक्षाओं के कारण भट्टाराई पार्टी से अलग हो गए। इसके नौ साल बाद लोगों के बीच भट्टाराई की लोकप्रियता को पहचानते हुए कोइराला ने 1999 में हुए चुनाव से एक दिन पहले भट्टाराई को पार्टी में वापस लाने की घोषणा की। कोइराला के इस चतुराई भरे निर्णय के बाद पार्टी चुनाव जीत गई।
तब भट्टाराई 1999 में दूसरी बार प्रधानमंत्री बने लेकिन कोइराला के दोबारा नेतृत्व करने की इच्छा के चलते उन्हें नौ महीने बाद ही इस्तीफा देना पड़ा। इसके तीन साल बाद भट्टाराई ने सक्रिय राजनीति छोड़ दी और चार साल बाद पार्टी से भी हट गए। भट्टाराई महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और जय प्रकाश नारायण जैसे भारतीय नेताओं के करीबी रहे। उनकी अंत्येष्टि रविवार को पशुपतिनाथ मंदिर परिसर में की जाएगी।












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