वित्त मंत्री सोमवार को पेश करेंगे बजट

भारतीय उद्योग संघ (सीआईआई) ने जहां मुद्रास्फीति को देखते हुए वित्त मंत्री से अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि न करने की सलाह दी है, वहीं जनता दल (युनाइटेड) के अध्यक्ष शरद यादव ने कहा है कि वित्त वर्ष 2011-12 के लिए संसद में पेश होने वाले बजट में कृषि योग्य उपजाऊ भूमि बचाने का प्रावधान होना चाहिए।

सीआईआई ने कहा है कि लगातार उच्च दर पर बनी मुद्रास्फीति को देखते हुए सोमवार को पेश होने वाले केंद्रीय बजट में अप्रत्यक्ष कर की दरों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए। इससे उद्योग के विकास को नुकसान पहुंचेगा।

सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने रविवार को जारी एक बयान में कहा, "मुद्रास्फीति के परिवेश को देखते हुए यह आवश्यक है कि अप्रत्यक्ष कर की दरों को वर्तमान स्तर पर रखने के साथ ही इसे प्रस्तावित वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के अनुरूप रखा जाए।"

ज्ञात हो कि मुखर्जी सोमवार को अपना छठा केंद्रीय केंद्रीय बजट पेश करने वाले हैं। उन्होंने कहा है कि कारोबारी वित्त मंत्री से आर्थिक सुधारों एवं विकास पर एक स्पष्ट नीति की दिशा चाहते हैं।

शरद यादव ने कहा कि वित्त वर्ष 2011-12 के लिए संसद में पेश होने वाले बजट में कृषि योग्य उपजाऊ भूमि बचाने का प्रावधान होना चाहिए। वह कोलकता में रविवार को पार्टी के एक कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे।

यादव ने कहा कि पिछले 62 साल में कुछ भी नहीं बदला है। बजट में देश की कृषि योग्य उपजाऊ जमीन को बचाने के लिए विशेष प्रावधान किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि कृषि योग्य भूमि पर विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) और हाई-टेक शहर बनाए जाते हैं तो यह गहरी चिंता का विषय है। कृषि योग्य भूमि को बचाने के लिए आवश्यक प्रावधान किए जाने चाहिए, क्योंकि यही पूरे देश को अन्न उपलब्ध कराता है। यही हमारी असली सम्पत्ति है, इसे बचाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।

बजट को लेकर विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है। कुछ का मानना है कि महंगाई से परेशान जनता को राहत देने के लिए वित्त मंत्री कुछ ऐसी घोषणाएं कर सकते हैं जो जनता के हित में हो। कुछ का मानना है कि सरकार आर्थिक सुधारों को जारी रखने के लिए कुछ सख्त भी भी उठा सकती है जो आम लोगों के लिए और मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

कुछ ऐसे भी जानकार हैं जो यह मानकर चल रहे हैं कि वित्त मंत्री बजट में संतुलन बनाकर चलेंगे ताकि किसी को परेशानी का अनुभव न हो।

ज्ञात हो कि अर्थव्यवस्था की स्थिति का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड, आर्थिक समीक्षा 2010-11 ने संकेत दिया है कि महंगाई कम से कम अल्प से मध्यम अवधि तक के लिए बनी रहेगी, भले ही देश का सकल घरेलू उत्पाद इस वित्त वर्ष में 8.6 प्रतिशत और अगले वित्त वर्ष में नौ प्रतिशत क्यों न रहे।

12 फरवरी को समाप्त हुए सप्ताह में खाद्य महंगाई की दर पूर्व के सप्ताह के 11.05 प्रतिशत के मुकाबले 11.49 प्रतिशत पर पहुंच गई थी। खाद्य पदार्थो की कीमतों को नापने वाला पैमाना 2010-11 के दौरान अधिकांश समय दो अंकों में बना रहा है।

वार्षिक मुद्रास्फीति की दर जनवरी में 8.23 प्रतिशत थी।

मुखर्जी को अक्सर सरकार का संकटमोचक कहा जाता रहा है, लेकिन उनके सामने एक दूसरी समस्या आ खड़ी हुई है। मध्य पूर्व एवं लीबिया में जारी अशांति के बाद कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें शुक्रवार को लगभग 112 डॉलर प्रति बैरेल पहुंच गईं। इससे इस बात की चिंता बनी हुई है कि अरब जगत में राजनीतिक अशांति के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

चूंकि अब तेल विपणन से जुड़ी कम्पनियों को इस बात की छूट है कि वे वैश्विक कीमतों के आधार पर पेट्रोल बेच सकती हैं, लिहाजा तेलों की कीमतों में होने वाली कोई भी बढ़ोतरी महंगाई को और हवा ही देगी।

इसके अलावा सरकार के सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रम भी हैं, जिनमें उचित आडिट के अभाव में पहले से ही निर्धारित कोष की बड़ी मात्रा लीक हो रही है। इनमें से तमाम कार्यक्रमों को सरकार बंद नहीं कर सकती, क्योंकि कई राज्यों में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं।

मुखर्जी को राजस्व वसूली बढ़ाने और वित्तीय घाटे को कम करने के लिए खर्च में कटौती करने के रास्ते भी तलाशने होंगे। इस वित्त वर्ष में वित्तीय घाटा 5.5 प्रतिशत के उच्च स्तर पर है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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