आयातित महंगे खाद्य तेलों का बढ़ रहा है बाजार
नई दिल्ली, 20 फरवरी (आईएएनएस)। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ रही सजगता और खर्च करने लायक आमदनी बढ़ने के कारण देश में महंगे आयातित खाद्य तेलों का बाजार लगातार बढ़ रहा है। इसे देखते हुए जैतून (ओलिव), रेपसीड (सफेद सरसों) और अन्य महंगे तेलों का कारोबार करने वाली कम्पनियां भारत में अपना कारोबार बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं।
स्पेन के दूतावास के वाणिज्यिक सलाहकार ने आईएएनएस से कहा कि देश में जैतून के तेल की लोकप्रियता बढ़ने के दो कारण हैं-प्रतिव्यक्ति आय का बढ़ना और जैतून तेल के फायदों के प्रति जागरूकता का बढ़ना।
भारत में जैतून के तेल का आयात मुख्यत: स्पेन से होता है। बोर्जेस, फिगारो, कार्बोनेल, लियोनाडरे और बटरेली स्पेन में जैतून के तेल के प्रमुख ब्रांड हैं। अभी देश में 7,500 टन जैतून के तेल का आयात प्रति वर्ष हो रहा है।
उधर कनाडा की कम्पनियां देश में राई (कैनोला) के तेल का निर्यात बढ़ाने की कोशिश में जुटी हैं। कैनोला काउंसिल ऑफ कनाडा का कहना है कि इस तेल में संतृप्त वसा का स्तर सबसे कम और ओमेगा-3 वसा सबसे अधिक होता है।
पिछले साल कनाडा ने देश में 721 टन राई के तेल का निर्यात किया था, जो 2009 के निर्यात से तीन गुना अधिक है।
हडसन, जिवो और सात्विक भारत में बिकने वाले कनाडा के राई तेल के प्रमुख ब्रांड हैं।
जैतून के तेल की कीमत 300 रुपये प्रति लीटर और राई के तेल की कीमत 195 रुपये प्रति लीटर को देखते हुए समृद्ध उपभोक्ता ही इसे खरीद सकते हैं। कम्पनियां हालांकि कीमतों को कम करने की कोशिश में लगी हैं।
सोब्स ने कहा कि कीमत घटाने की रणनीति के तहत स्पेनी कम्पनियां देश में जैतून के तेल की खेती करने की योजना बना रही हैं।
नेशनल डायबिटीज, ओबेसिटी और कोलेस्ट्रॉल फाउंडेशन की मुख्य परियोजना अधिकारी सीमा गुलाटी ने कहा कि बेहतर स्वास्थ्य के लिए हमें ऊंचे पॉली-अनसैचुरेटेड फैटी एसिड वाले तेल की जगह ऊंचे मोनो-अनसैचुरेटेड फैटी एसिड कम्पोजिशन वाले तेल का इस्तेमाल करना चाहिए, जो जैतून और राई वाले तेल का विशेष गुण है।
गुलाटी हालांकि अधिक महंगे तेल न खरीद सकने वाले उपभोक्ताओं को सरसों, सोयाबीन और सूरजमुखी के तेल का इस्तेमाल बदल-बदल कर करने की सलाह देती हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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