'हिंगोट युद्ध' में फिर चलेंगे बारूद से भरे हिंगोट

इंदौर, 4 नवंबर (आईएएनएस)। इंदौर के गौतमपुरा इलाके में वषरें से चली आ रही 'हिंगोट युद्ध' की परम्परा अब भी कायम है और इस बार भी दीपावली के अगले दिन बारूद से भरे हिंगोटों (गोलों) की बरसात होगी। इस युद्ध में हार-जीत किसी की नहीं होती लेकिन जख्मी कई होते हैं।

परम्परा के मुताबिक दीपावली के अगले रोज देपालपुर इलाके की गौतमपुरा तहसील के मैदान में तुर्रा और कलंगी गांव के लोग 'हिंगोट युद्ध' के लिए अपने-अपने हिंगोटों को लेकर जमा होते हैं। युद्ध में शामिल होने वालों के पास कोई सुरक्षा कवच नहीं होता। अगर उनके पास कुछ होता है तो वह है-हिंगोट।

हिंगोट एक फल (नारियल जैसा) होता है, जिसकी पैदावार देपालपुर इलाके में होती है। जिसे लोग दीपावली से लगभग दो माह पहले खोखला कर सुखा लेते हैं, फिर उसके भीतर बारूद भरी जाती है। फिर इसमें एक ओर लकड़ी लगाई जाती है, युद्ध के दौरान जब इसमें आग लगाई जाती है तो यह रॉकेट की तरह आकाश में उड़ान भरता हुआ, दूसरे पक्ष को नुकसान पहुंचाता है।

दीपावली के अगले दिन पड़वा को दोनों गांवों के लोग एक-दूसरे पर हिंगोट से वार करते हैं। यह सिलसिला कई घंटे चलता है और इस युद्ध में कई लोगों का घायल होना आम बात है। इस बार प्रशासन भी चिंतित है। वह हिंगोट युद्ध में हिस्सा लेने वालों से लगातार आग्रह कर रहा है कि वे परम्परा को तो निभाएं मगर हिंगोट का कम से कम इस्तेमाल करें।

विधायक सत्यनारायण पटेल कहते है कि 'हिंगोट युद्ध' इस इलाके की परम्परा है और यह कायम रहेगी या नहीं, इसका फैसला जनता करेगी। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि वह 'हिंगोट युद्ध' में हिस्सा लेने वाले प्रतिभागियों को हेलमेट और जैकेट उपलब्ध कराएं। थाने से यह सामग्री प्रतिभागियों को दी जाए। पटेल स्वयं भी प्रतिभागियों की सुरक्षा के लिए ढाल बनवा रहे हैं ताकि युद्ध में कम से कम लोग आहत हों।

वषरें से चली आ रही इस परम्परा में न तो कोई जीतता है और न ही किसी की हार होती है। यहां पहुंचने वाले प्रतिभागी भी हार-जीत के लिए नहीं बल्कि परम्परा को निभाने के लिए यहां पहुंचकर हिंगोट से प्रहार करते हैं। यह परम्परा कब, किसने, किस उद्देश्य से शुरू की इसकी जानकारी किसी को नहीं है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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