प्रियदर्शिनी हत्याकांड : मृत्युदंड की सजा बदली, परिवार निराश (लीड-3)

न्यायमूर्ति एच.एस. बेदी और न्यायमूर्ति के.सी प्रसाद की खंडपीठ ने एक पूर्व पुलिस अधिकारी के बेटे संतोष कुमार सिंह को प्रियदर्शिनी के साथ बलात्कार और उसकी हत्या का दोषी करार दिया, लेकिन अदालत ने 2006 में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा सिंह को सुनाई गई मृत्युदंड की सजा को कम कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, "पक्का चिट्ठा सीमांत रूप से आरोपी के पक्ष में है। दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उसकी मृत्युदंड की सजा बदली गई है।"

प्रियदर्शिनी मट्टू के पिता सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता चमन लाल मट्टू ने बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने पर कहा कि वह 'पूरी तरह चूर-चूर' हो गए हैं। अपनी जिद पर अड़े मट्टू ने इसे बुरा उदाहरण बताते हुए कहा कि वह आखिरी सांस तक अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।

उन्होंने आईएएनएस से कहा, "यह मेरी जिंदगी का सबसे दुखद दिन है। सर्वोच्च न्यायालय ने मेरे और मेरी बेटी के साथ इंसाफ नहीं किया है।"

उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय को चाहिए था कि वह दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखता और अभियुक्त को फांसी के फंदे तक भेजता। मट्टू ने कहा कि वह 'पूरी तरह से बिखरा' महसूस कर रहे हैं।

मट्ट ने कहा, "मैं अपनी बेटी के लिए इंसाफ की लड़ाई नहीं छोड़ूंगा। आखिरी सांस तक इस मामले की लड़ाई जारी रखूंगा।"

एक अन्य घटना में हत्या के शिकार नीतीश कटारा की मां नीलम ने कहा, "मैं जानती हूं कि अपने बच्चे को खोने पर कैसा लगता है। हमारे देश में उम्रकैद का मतलब गुनाहगारों के लिए आजादी है। वे जल्द ही जमानत पर छूट जाते हैं।"

नीतीश की उत्तर प्रदेश के नेता डी.पी. यादव के बेटे विकास ने वर्ष 2002 में हत्या कर दी थी। इसकी वजह यादव की बेटी भारती और नीतीश के बीच मित्रता थी।

बेटे के हत्यारों को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाली नीलम ने मट्ट से जुड़े न्यायालय के ताजा फैसले पर कहा कि उम्रकैद से दोषियों को उनके किए की सजा नहीं मिल पाती।

उन्होंने कहा, "मैं मट्ट परिवार की निराशा समझ सकती हूं। हमारे देश में हत्या को क्रूरतम अपराध नहीं माना जाता इसलिए यहां बड़ी संख्या में हत्याएं होती हैं। हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली की यह खामी है।"

विश्वविद्यालय के लॉ कालेज की तृतीय वर्ष की छात्रा प्रियदर्शिनी ने संतोष के खिलाफ तीस हजारी अदालत के एक वकील, पुलिस एवं अपने कालेज के अधिकारियों से शिकायत की थी कि संतोष उसे परेशान करता है।

उल्लेखनीय है कि संतोष ने दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी कनिष्ठ प्रियदर्शिनी मट्टू की दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी थी। 23 जनवरी, 1996 को मट्ट का शव उसके एक रिश्तेदार के वसंत कुंज स्थित एक फ्लैट से बरामद किया गया था। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की एक विशेष अदालत ने दिसम्बर 1999 में संतोष को सजा से मुक्त कर दिया था। लेकिन अक्टूबर, 2006 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने संतोष को मौत की सजा सुनाई थी।

सीबीआई के वकीलों की टीम में शामिल रंजना नारायण ने संतोष की अपील का विरोध किया था। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर टिप्पणी करते हुए कहा, "मैं खुश हूं कि उसका दोष बरकरार रखा गया है।"

उधर, इस मामले में न्याय की लड़ाई लड़ रहे कार्यकर्ताओं ने फैसले पर निराशा जताई। उन्होंने कहा कि इस तरह के अपराध ने देश को हिलाकर रख दिया है। उन्होंने सीबीआई से समीक्षा याचिका पेश करने को कहा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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