अमेरिकी सीनेट में आउटसोर्सिग संबंधी विधेयक खारिज

इस विधेयक को 100 सदस्यीय सीनेट में 45 के मुकाबले 53 मतों से खारिज कर दिया। रिपब्लिकन सदस्यों ने इस कदम का खुलकर विरोध किया। भारत जैसे विकासशील देश ऐसे कदमों को 'आर्थिक संरक्षणवाद' से जोड़कर देखते हैं।

सीनेट में खारिज हुए विधेयक में मुख्य तौर पर तीन प्रावधानों का जिक्र किया गया था। पहला, उन अमेरिकी कम्पनियों को कर में मिलने वाली राहत को 24 महीने तक रोक दिया जाए जो घरेलू कर्मचारियों के स्थान पर दूसरे देशों के लोगों को रोजगार देती हैं।

दूसरा, कामों को आउटसोर्स करने वाली कम्पनियों के कर से जुड़े फायदों को खत्म किया जाए। तीसरा, विदेशी कम्पनियों की कमाई के उस हिस्से पर कर में छूट को खत्म किया जाए जो वे विदेशों से आयातित संपत्ति के बल पर हासिल करती हैं।

इस विधेयक को इलिनॉय के सीनेटर रिचर्ड डरबिन द्वारा पेश किया गया था। इसका मकसद वर्ष 1996 के आंतरिक राजस्व कोड में संशोधन कर अमेरिकियों के लिए ज्यादा से ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा करना और आउटसोर्सिग पर लगाम लगाना था।

अमेरिका में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की लगभग 11,000 कम्पनियों के संगठन 'टेकअमेरिका' ने इस कदम का विरोध किया था। उसका कहना था कि विधेयक के कानून की शक्ल ले लेने की स्थिति में अमेरिकी अर्थव्यवस्था संकट से उबरने की बजाय और पीछे चली जाएगी।

वैसे भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने एक सप्ताह पहले ही अपने अमेरिकी प्रवास के दौरान इस कदम और अमेरिकी सरकार की ओर से लगाई गई कुछ अन्य कारोबारी अवरोधों पर खुलकर चिंता जाहिर की थी।

गौरतलब है कि पिछले दिनों अमेरिकी प्रांत ओहियो ने आउटसोर्सिग पर पाबंदी लगा दी थी। इसके अलावा वीजा शुल्क में वृद्धि और उच्च रक्षा तकनीक के निर्यात पर नियंत्रण जैसे संरक्षणवादी कदमों पर भी भारत ने चिंता जताई थी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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