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पैसे की कमी से जूझ रहा है सिनेमा : अनुराग कश्यप

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    मीडिया ब्लॉग 'मोहल्ला लाइव' द्वारा सूरजकुंड में सिनेमा पर विमर्श के लिए आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला 'बहसतलब' के पहले दिन अनुराग कश्यप ने यह बात कही। कार्यशाला में पहले सत्र का विषय था 'किसके हाथ में बॉलीबुड की कटेंट फैक्ट्री की लगाम'।

    इस कार्यशाला में मौजूदा मुख्यधारा के सिनेमा से जुड़े अंतर्विरोधों और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा के दौरान कश्यप ने कहा, "सिनेमा एक बेहद महंगी कला है। यह चित्रकला और दूसरी कलाओं से अलग है और अब यह व्यापार बन गया है।"

    कश्यप ने सिनेमा उद्योग की समस्याओं को उजागर करते हुए कहा कि मौजूदा सिनेमा में पैसे की अहम भूमिका है। उन्होंने कहा कि वैश्विक सिनेमा इन दिनों वित्तीय परेशानियों से जूझ रहा है। ज्यादातर देशों में वास्तविक सिनेमा सरकारी मदद के चलते ही अपनी साख बचा पाने में सफल हुए हैं।

    उन्होंने कहा कि कई देश तो सिनेमा को पर्यटन को बढ़ावा देने का तरीका मानते हुए सरकारी अनुदान दे रहे हैं। कश्यप ने कहा कि भारत में फिल्मों की विषय वस्तु को लेकर तमाम तरह की पाबंदियां भी परेशानी का विषय हैं। उन्होंने कहा कि पाबंदियों से परेशान होकर वह वास्तविक नामों वाले चरित्रों को लेकर बनी 'ब्लैक फ्राइडे' जैसी कोई और फिल्म बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।

    कश्यप ने कहा, "कम बजट की फिल्मों में निर्देशक को विषयवस्तु के चयन में पूरी छूट मिलती है। लेकिन फिल्म का बजट बढ़ने पर वितरक भी हस्तक्षेप करते हैं और फिल्म में मध्यांतर के समय में भी बदलाव की मांग करते हैं। इससे निर्देशक को कहानी दो भागों में बांटनी पड़ती है।"

    'हजारों ख्वाहिशें ऐसी', 'ट्रैफिक सिग्नल' और 'खोया-खोया चांद' जैसी फिल्मों को निर्देशित कर चुके सुधीर मिश्र ने कहा कि फिल्म निर्माण के लिए निर्देशक की व्यक्तिगत क्षमता महत्वपूर्ण है। निर्देशक में बाजार से पैसा जुटाने की क्षमता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि फिल्म की सफलता या असफलता के निर्णय को तात्कालिक मुनाफे से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।

    वहीं 'लीविंग होम' और 'हल्ला' जैसी फिल्मों के निर्देशक जयदीप वर्मा ने कहा कि यह भारतीय सिनेमा का यह सबसे खराब दौर है। पैसे की कमी सिनेमा की सबसे बड़ी परेशानी है। वर्मा ने कहा भारत सबसे ज्यादा विविधता वाला देश है, लेकिन यहां सबसे कम विविधता वाली फिल्में बनती हैं।

    वर्मा ने भारतीय सिनेमा के मौजूदा रोल मॉडल्स पर अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा कि आमिर खान को छोड़कर सिनेमा में बदलाव की असली कोशिश कोई नहीं कर रहा। उन्होंने कहा कि हम अभी भी मानसिक रूप से गुलाम हैं, इसका नजारा फिल्म निर्माण क्षेत्र में भी देखने को भी मिलता है। फिल्म निर्माता मौलिक कहानियों को स्वीकार नहीं करते जबकि युवा भारत के नाम पर स्तरहीन फिल्में बनाई जा रही हैं।

    वहीं फिल्म 'पीपली लाइव' की कहानी लिखने वाली अनुषा रिजवी ने कहा कि फिल्म की सफलता को थियेटर के कलेक्शन से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। अच्छा सिनेमा आज भी पसंद किया जाता है।

    दूसरे सत्र का विषय था 'न तुम हमें जानो, न हम तुम्हें जाने'। इस सत्र में हिंदी सिनेमा में स्त्री-पुरुष संबंधों के साथ हुए ट्रीटमेंट पर विमर्श किया गया।

    'मिस्टर सिंह मिसेज मेहता' फिल्म के निर्देशक प्रवेश भारद्वाज ने कहा कि हिन्दी सिनेमा में 'दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसी फिल्मों से 'एनआरआई रुचि' की धारणा पनपी थी। विदेशों में बैठकर फिल्में लिखी जा रही थीं। प्रवेश ने स्त्री-पुरुष संबंधों पर विमर्श के दौरान हिन्दी सिनेमा में प्रेम की अवधारणाओं पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि प्रेम की इन अवधारणाओं ने स्त्री-पुरुष संबंधों को भ्रामक रूप से प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि इम्तियाज अली जैसे फिल्मकारों ने दूसरे प्रेम (सेकेंड लव) की अवधारणा को स्वीकृति दिलाई।

    सिनेमा में स्त्री-पुरुष संबंधों पर विमर्श के दौरान सुधीर मिश्र ने कहा कि 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' फिल्म में हिन्दी सिनेमा की प्रेम की कल्पित अवधारणाओं की वर्जनाएं तोड़ते हुए नारी के विवाहेतर संबंधों की ख्वाहिश का यथार्थवादी चित्रण किया गया है। देव-डी, लव-आजकल और देवदास जैसी फिल्में ने भी इन संबंधों को अपने-अपने अंदाज में यथार्थवादी रूप से प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि हालांकि हिंदुस्तानी सिनेमा ने समाज के सामाजिक मूल्यों का बखूबी संरक्षण किया है।

    लेखक एवं पत्रकार विनोद अनुपम ने कहा कि हिंदी सिनेमा अब स्त्री पुरुष संबंधों के नाम पर विवाहेतर संबंधों और प्रेमी-प्रेमिका के रिश्तों पर अटक गया है। मौजूदा सिनेमा से समाज, रिश्ते और सामाजिक नियंत्रण गायब हो गया है।

    'पीपली लाइव' के सह-निर्देशक महमूद फारूकी ने कहा कि आज का सिनेमा अंग्रेजी बोलने वाले उच्च वर्ग के दर्शकों का सिनेमा है। सिनेमा में विषयों की विविधता लाने के लिए हमें शिक्षित दर्शकों की आवश्यकता जैसी वर्जनाओं को तोड़ना होगा और सभी वर्ग के लोगों को सिनेमा का दर्शक मानना पड़ेगा।

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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