यमुना एक्सप्रेस वे: भू-अधिग्रहण को सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी

इस एक्सप्रेसवे के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 1604 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण की अधिसूचना जारी की थी. पिछले कई साल से इसका विरोध कर रहे किसानों की याचिकाएँ न्यायिक प्रक्रिया के विभिन्न चरणों से गुज़री और बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के अपना फ़ैसला सुनाया. उत्तर प्रदेश सरकार की योजना है कि नोएडा से आगरा तक लगभग 165 किलोमीटर का एक्सप्रेसवे तैयार किया जाए और सात ही पाँच टाउनशिप्स का विकास किया जाए.
इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इन किसानों की भू-अधिग्रहण पर आपत्ति जताने वाली याचिकाओं को ख़ारिज किया था और अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराया है. महत्वपूर्ण है कि भू-अधिग्रहण के विभिन्न चरणों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में किसानों के व्यापक प्रदर्शन हुए थे और कई जगहों पर हिंसा भी हुई थी.
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस वीएस सिरपुरकर और जस्टिस सिरिएक जोज़फ़ की पीठ ने हाई कोर्ट की राय का अनुमोदन करते हुए कहा कि एक्सप्रेसवे के निर्माण से लाखों लोगों को फ़ायदा होगा. ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील नहीं माना जिसमें कहा गया था कि इस परियोजना के लिए किया जा रहा भू-अधिग्रहण सार्वजनिक जनहित के लिए नहीं बल्कि निजी कंपनी के हित में है.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "एक्सप्रेसवे सार्वजनिक महत्व का काम है. इससे राज्य को और आम जनता को भी लाभ होगा. तेज़ रफ़्तार से जाने वाले ट्रैफ़िक के लिए विशेष रास्ता बनाने से समय की बचत होगी और सामान जल्द पहुँचेगा और ये सब इस परियोजना के पक्ष में जाता है." सुप्रीम कोर्ट की पीठ का ये भी मानना था कि परियोजना के कारण राज्य में पाँच विकसित क्षेत्र बनेगें जिनका नागरिकों को फ़ायदा होगा और इससे औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े इलाक़े का योजनाबद्ध विकास होगा."
याचिकाकर्ताओं ने एक्सप्रेसवे के लिए भू-अधिग्रहण संबंधित भू-अधिग्रहण क़ानून 1894 की धारा चार-पाँच और छह के तहत आपत्तियाँ दर्ज न करवा पाने की दलील भी दी थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे मानने से इनकार कर दिया. पर्यवेक्षकों के अनुसार इस फ़ैसले से जहाँ एक्सप्रेसवे के लिए भू-अधिग्रहण और निर्माण का रास्ता साफ़ हो गया है वहीं उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार के लिए ये बड़ी जीत है.
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