ऑक्सीजन से सभी मरीजों को फायदा नहीं
आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका में 240 मरीजों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि रोगियों को आसानी से सांस लेने के लिए ऑक्सीजन दिए जाने का कोई वैज्ञानिक अधार नहीं है।
चिकित्सा क्षेत्र की अग्रणी पत्रिका 'द लासेंट' में कहा गया है कि डाइस्पेनिया नाम की बीमारी की चपेट में आने से सांस लेने की दिक्कतें बढ़ जाती हैं। दिल की बीमारी वाले 60 फीसदी, फेफड़े के कैंसर से पीड़ित 70 फीसदी और सांस संबंधी बीमारियों से ग्रसित अन्य 90 फीसदी लोगों में यह समस्या पाई जाती है।
आस्ट्रेलिया में स्थित 'फ्लेन्डर्स यूनिवर्सिटी' के अनुसंधानकर्ता डेविड कूरोव ने कहा, "जब आप के चेहरे पर हवा दी जाएगी, तो आराम मिलेगा। इस अध्ययन से साबित होता है कि अधिकतर लोग खुद ऑक्सीजन नहीं लेते हैं।"
उत्तरी केरोलिना स्थित ड्यूक विश्वविद्यालय के एक दूसरे अनुसंधानकर्ता एमी अर्बेनेठी ने कहा, "सामान्य क्रिया कलाप जैसे टहलना, बातचीत करना और सामाजिक समस्याओं की तरह ही सांस लेने की तकलीफ से मरीज घबरा जाता है और परिजन प्रभावित होते हैं।"
गौरतलब है कि चिकित्सकीय निर्देशों में कहा गया है कि मरीज को उस वक्त ऑक्सीजन देने की जरूरत पड़ती है, जब उसके खून में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इस हालत में यह शरीर की कोशिकाओं तक सही तरीके से नहीं पहुंच पाती है।
बड़ी संख्या में ऐसे मरीजों को भी देखा गया है कि गंभीर स्थित में भी उनके खून में ऑक्सीजन का स्तर नहीं गिरता है। इसके बावजूद उन्हें सांस लेने में दिक्कतें होती हैं।उधर, इतने ही मरीजों पर किए गए अध्ययन पाया गया कि अतिरिक्त ऑक्सीजन से उन्हें कोई फायदा नहीं पहुंचता।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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