माओवादी मैदान से हटे, भारतीय राजदूत नेपाल से मिले (राउंडअप)
सुदेशना सरकार
मुंबई, 5 सितम्बर (आईएएनएस)। नेपाल में प्रधानमंत्री पद के लिए रविवार को आयोजित छठे दौर के चुनाव की विफलता के बाद माओवादी प्रमुख पुष्प कमल दहाल प्रचंड ने चुनाव मैदान से हटने का फैसला किया। दूसरी ओर चुनाव परिणाम आने से पूर्व नेपाल में भारतीय राजदूत ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल से मुलाकात की और देश के राजनीतिक हालात पर चर्चा की।
सांसदों की खरीद-फरोख्त के लिए चीन से धन मांगने के आरोपों से घिरे 55 वर्षीय प्रचंड एक बार फिर 599 सदस्यीय संसद में साधारण बहुमत पाने में नाकाम रहे।
माओवादी पिछले सप्ताह सामने आए उस विवादित आडियो टेप के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, जिसमें एक व्यक्ति ने खुद को माओवादी सांसद कृष्ण बहादुर महारा बताया है और उसने चीन स्थित एक मित्र से रविवार के चुनाव के लिए 50 सांसदों को खरीदने हेतु 50 करोड़ नेपाली रुपये की मांग की।
बहरहाल, सत्ता की चाबी फिलहाल सत्तारूढ़ कम्युनिस्टों और तराई की चार पार्टियों के पास है और उन्होंने इस बार भी वही रुख अपनाया, जो रुख उन्होंने पूर्व के पांचों दौर के मतदान के दौरान अपनाया था। इससे प्रचंड या उनके प्रतिस्पर्धी नेपाली कांग्रेस के रामचंद्र पौडेल बहुमत के लिए आवश्यक 300 सांसदों का समर्थन हासिल करने में रविवार को भी विफल रहे।
प्रचंड के पक्ष में 240 वोट पड़े, 101 सांसदों ने उनके विरोध में वोट दिया और 163 अनुपस्थित रहे।
पौडेल को केवल 122 वोट मिले, 242 ने उनके विरोध में वोट दिया और 172 अनुपस्थित रहे।
अपनी संभावित हार को देखते हुए माओवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने चुनाव के पहले एक आपात बैठक में यह फैसला किया कि वे सातवें दौर के चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे। इसके बजाए वे अन्य पार्टियों और समाज के अन्य लोगों के साथ नई सरकार के गठन पर चर्चा करेंगे।
माओवादी पार्टी के लिए यह कार्य भी आसान नहीं होगा। क्योंकि शांति समझौते पर दस्तखत करने के बावजूद हथियार डालने से इंकार करने और सत्ता के लालच की वजह से पार्टी और प्रचंड की छवि और विश्वसनीयता बहुत अधिक प्रभावित हुई है।
सबसे बड़ी संसदीय पार्टी के नेता प्रचंड को सत्ता हासिल करने के लिए केवल 64 अन्य सांसदों का समर्थन आवश्यक था। इसके लिए उन्होंने कई दलों से सौदेबाजी का प्रयास किया और दोनों पक्षों का अवसरवाद खुलकर सामने आया।
राजशाही के खिलाफ और धर्मनिरपेक्षता के लिए लड़ने वाले माओवादी सत्ता हासिल करने के लिए राजशाही समर्थक और हिंदू ताकतों से भी गठजोड़ को तैयार हो गए थे।
वर्तमान सरकार का कार्यकाल केवल एक वर्ष बचा है और खबरों के अनुसार माओवादी अब सत्ता साझेदारी के लिए तैयार हैं। तराई की क्षेत्रीय पार्टियों के साथ तय इस फार्मूले के अनुसार अप्रत्याशित तौर पर तीन उपप्रधानमंत्री होंगे।
शांति समझौते के अनुसार देश का नया संविधान पिछली मई तक तैयार नहीं हो सका और संदेह है कि वह अगले वर्ष तक भी तैयार हो पाएगा।
कार्यवाहक सरकार बजट पारित नहीं कर सकती और इस कारण देश कोष की कमी से जूझ रहा है।
इस बीच छठे दौर के लिए मतदान होने से पूर्व नेपाल में भारतीय राजदूत राकेश सूद ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल से मुलाकात की।
प्रधानमंत्री के विदेशी मामलों के सलाहकार राजन भट्टराई ने कहा कि मुलकाता के दौरान द्विपक्षीय मुद्दों, नेपाल के राजनीतिक हालात और संयुक्त राष्ट्र की राजनीतिक एजेंसी के कार्यकाल के बारे में चर्चा हुई।
माओवादियों के कहने पर वर्ष 2007 में जारी शांति प्रक्रिया में मदद के लिए नेपाल स्थित संयुक्त राष्ट्र मिशन (यूएनएमआईएन) को आमंत्रित किया गया था।
यूएनएमआईएन का कार्यकाल 15 सितंबर को समाप्त हो जाएगा। लेकिन लंबे राजनीतिक गतिरोध और छह दौर के चुनाव के बाद भी राजनीतिक पार्टियों की नया प्रधानमंत्री चुन पाने की अक्षमता के कारण सरकार ने अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा है कि यूएनएमआईएन का कार्यकाल बढ़ाया जाएगा या नहीं।
जहां एक ओर माओवादी चाहते हैं कि यूएनएमआईएन यहां बना रहे, वहीं नेपाल की प्रमुख पार्टियों के साथ ही राष्ट्रीय सेना इसके खिलाफ है।
खासतौर से सेना महसूस करती है कि उसके सैनिकों को ज्यादा समय तक संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में अब नहीं रहना चाहिए। क्योंकि आतंकवाद समाप्त हो चुका है और चुनाव संपन्न हो गए हैं।
दूसरी ओर यूएनएमआईएन का कार्यकाल बढ़ाए जाने के संदर्भ में राजनीतिक पार्टियों की उदासीनता के लिए माओवादी भारत को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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