मप्र में शिक्षकों की स्थिति मजदूरों से बदतर!

भोपाल, 5 सितम्बर (आईएएनएस)। अपने देश में गुरु का सनातन काल से ही सम्मान होता आ रहा है और उनका दर्जा ईश्वर से भी ऊपर माना जाता है लेकिन मध्य प्रदेश में तो सरकार ने गुरुओं का बुरा हाल कर दिया है। कहीं उन्हें मजदूरों से भी कम वेतन मिल रहा है तो कहीं उनसे पढ़ाई के अलावा कई अन्य काम लिए जा रहे हैं।

केंद्र हो अथवा राज्य सरकारें, सभी ने न्यूनतम मजदूरी दर तय कर रखी है और यही कारण है कि मजदूरों को 100 रूपये प्रतिदिन मिलते हैं। परंतु मध्य प्रदेश मे अनुदान प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों को इन मजदूरों के बराबर भी वेतन नही मिल रहा है।

प्रदेश में 6500 से ज्यादा अनुदान प्राप्त शिक्षक हैं, जिन्हें सिर्फ 1800 रुपये प्रति माह मिल रहे हैं। प्रदेश सरकार पूर्व में अनुदान प्राप्त विद्यालयों को अनुदान देती आई है लेकिन पिछले कुछ अरसे से इस पर रोक लगा दी है। इसी का परिणाम है कि शिक्षकों को वेतन के लाले पड़ने लगे हैं। इन शिक्षकों का वेतन के लिए संघर्ष जारी है।

अनुदान प्राप्त एक विद्यालय के शिक्षक डॉक्टर के. दीक्षित का कहना है कि सरकार की बेरुखी के कारण उन्हें तो चौथे वेतनमान का आधा वेतन ही मिल रहा है वहीं दीगर शिक्षकों को छठे वेतनमान का लाभ मिल रहा है। सरकार की इस नीति के कारण उन्हें जिंदगी को चलाना भी मुश्किल हो चला है।

इतना ही नहीं प्रदेश में निजी शिक्षण संस्थाओं की भी भरमार है, जहां शिक्षकों की न तो योग्यता का कोई पैमाना है और न ही वेतन के कोई नियम हैं। इसका सीधा असर शिक्षा व्यवस्था पर पड़ रहा है।

इसके अलावा सरकार शिक्षकों से शिक्षण के अलावा दीगर काम लेने में भी पीछे नहीं है। गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों का सर्वेक्षण हो, राशन कार्ड बनना हो या मतदाता पुनरीक्षण का काम या जनसंख्या का कार्य अथवा बाबूगिरी। इन सभी कामों में शिक्षकों को लगाया जाता है। इसके चलते शिक्षण कार्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

सरकार के इस रवैए से परेशान शिक्षकों का शनिवार को शिक्षा मंत्री अर्चना चिटनीस सहित विभागीय अधिकारियों की मौजूदगी में आयोजित राज्यस्तरीय संगोष्ठि में गुस्सा फूट पड़ा। इतना ही नहीं उन्होंने विभाग के रवैए को जमकर कोसा।

शिक्षक विभागीय नीतियों में लगातार होने वाले बदलाव को शिक्षा के लिए उचित नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि एक योजना आगे बढ़ नहीं पाती है और दूसरे व नए प्रयोग की कवायद तेज हो जाती है। इतना ही नहीं शिक्षकों को बाबूगिरी के काम में लगाया गया है।

मध्य प्रदेश में शिक्षा जगत के प्रति सरकार की कार्यप्रणाली यहीं नहीं ठहर जाती है बल्कि समान योग्यताधारियों को अलग अलग नाम व वेतन की व्यवस्था भी शिक्षकों में असंतोष बढ़ा रही है। यहां शिक्षकों को शिक्षाकर्मी, संविदा शिक्षक, गुरुजी, अध्यापक के नाम से पुकारा जाता है। यह सारी व्यवस्था वेतन के चलते की गई है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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