शिक्षकों को अज्ञानता और पूर्वाग्रह से बचना चाहिए : प्रधानमंत्री (लीड-1)

प्रधानमंत्री ने एक शिक्षक के रूप में अपने दिनों को याद करते हुए कहा कि वह उनके जीवन का अति संतोषजनक चरण था। "किसी राष्ट्र और वहां के लोगों की संस्कृति व मूल्य शिक्षकों से फूटते हैं।"

प्रधानमंत्री ने यहां शिक्षक दिवस पुरस्कार प्राप्त करने वाले शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा, "शिक्षकों की मूल्य प्रणाली, उनके चरित्र और उनकी आदतें सीधे तौर पर हमारे बच्चों को प्रभावित करती हैं।"

ज्ञात हो कि देश के दूसरे राष्ट्रपति, विद्वान व चिंतक डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में उनके जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

प्रधानमंत्री ने कहा, "लेकिन कभी-कभी बच्चे गलत सूचना और सीमित अध्ययन की आदत को अपना लेते हैं, ऐसा शिक्षकों की अज्ञानता, नासमझी या पूर्वाग्रह को जाहिर करता है। हमें इन नकारात्मक चरित्रों को अपने भीतर आने से रोकना चाहिए।"

प्रधानमंत्री ने कहा कि शैक्षिक विकास एवं शिक्षा में सुधार लाने के लिए शिक्षकों को सशक्त बनाकर उन्हें नीति निर्धारण और निर्णय लेने संबंधी प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के सभी शिक्षकों को समानता और शिक्षा प्रणाली की समग्रता पर जोर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश में विशेष तौर पर बालिकाओं या अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति या अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों और शारीरिक व मानसिक चुनौतियों का सामना कर रहे बच्चों में समानता तथा समग्रता के दृष्टिकोण से कई कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। उन्होंने कहा कि ये कार्यक्रम तभी सशक्त युवाओं और नागरिकों को तैयार कर सकेंगे यदि उनके शिक्षक समानता और समग्रता के समर्थक होंगे।

प्रधानमंत्री ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम एवं प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बताने वाला संविधान का अनुच्छेद 21-ए, पहली अप्रैल, 2010 से लागू हो चुके हैं। अब वक्त आ गया है कि हम सभी परिस्थिति में बदलाव लाएं और यह सुनिश्चित करें कि देश के हरेक बच्चे को समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार हासिल हो।

प्रधानमंत्री ने कहा, "आज आप लोगों के समक्ष देश के सभी बच्चों को अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा मुहैया कराने की चुनौती और अवसर है। स्कूल का माहौल भय मुक्त होना चाहिए। शिक्षा का अधिकार शारीरिक दंड एवं मानसिक प्रताड़ना पर प्रतिबंध लगाता है।"

इस महत्वपूर्ण मसले पर विख्यात दार्शनिक जिद्दू कृष्णामूर्ति ने कहा, "अनुशासन बच्चे को नियंत्रित करने का आसान तरीका है, लेकिन यह जीवन की समस्याओं को समझने में मददगार नहीं होता।..यदि शिक्षक प्रत्येक बच्चे पर पूरा ध्यान दें, उस पर नजर रखें और उसकी मदद करें, तो किसी भी तरह की जबरदस्ती या अनुशासन बेमानी हो जाएंगे।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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