शिक्षकों की नीति निर्माण में भागीदारी जरूरी : प्रधानमंत्री(शिक्षक दिवस-5 सितंबर)
नई दिल्ली, 4 सितम्बर (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि देश में शैक्षिक विकास एवं शिक्षा में सुधार लाने के लिए शिक्षकों को सशक्त बनाकर उन्हें नीति निर्धारण और निर्णय लेने संबंधी प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए।
शिक्षक दिवस से एक दिन पूर्व यहां शनिवार को पुरस्कृत शिक्षकों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, "देश में शिक्षकों की समर्पित सेवाओं के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने के लिए हम पांच सितम्बर को पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर राधाकृष्णन की जयंती के मौके पर देश भर में शिक्षक दिवस मनाते हैं। "
प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के सभी शिक्षकों को समानता और शिक्षा प्रणाली की समावेशिता पर जोर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश में विशेष तौर पर बालिकाओं या अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति या अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों और शारीरिक व मानसिक चुनौतियों का सामना कर रहे बच्चों में समानता तथा समावेशिता के दृष्टिकोण से कई कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। उन्होंने कहा कि ये कार्यक्रम तभी सशक्त युवाओं और नागरिकों को तैयार कर सकेंगे यदि उनके शिक्षक समानता और समावेशिता के सशक्त समर्थक होंगे।
उन्होंने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम एवं प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बताने वाला संविधान का अनुच्छेद 21-ए गत एक अप्रैल 2010 से लागू हो चुके हैं। अब वक्त आ गया है कि हम सभी इस परिस्थिति में बदलाव लाएं और यह सुनिश्चित करें कि हमारे देश के हरेक बच्चे को समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार हासिल हो। इस तरह हम शिक्षा के अधिकार को एक व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन में तब्दील कर दें।
प्रधानमंत्री ने कहा, "आज आप लोगों के समक्ष हमारे सभी बच्चों को अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा मुहैया कराने की चुनौती और अवसर हैं। .. स्कूल का माहौल भय, सदमे और चिंताओं से मुक्त होना चाहिए। किसी भी बच्चे को चाहे वह किसी जाति, लिंग या समुदाय का हो, स्कूल जाने से भय नहीं लगना चाहिए। शिक्षा का अधिकार शारीरिक दंड एवं मानसिक प्रताड़ना पर प्रतिबंध लगाता है। यह ्नरोकने और निष्कासन पर भी प्रतिबंध लगाता है।
इन प्रावधानों की वजह से कई शिक्षकों ने सवाल उठाया है कि कक्षा में अनुशासन कैसे रखा जाएगा। इस महत्वपूर्ण मसले जवाब विख्यात दार्शनिक जिद्दू कृष्णामूर्ति ने दिया है "अनुशासन बच्चे को नियंत्रित करने आसान तरीका है, लेकिन यह जीवन की समस्याओं को समझने में मददगार नहीं होता।..यदि शिक्षक प्रत्येक बच्चे पर पूरा ध्यान दें, उस पर नजर रखे और मदद करे, तो किसी भी तरह की जबरदस्ती या प्रभुत्व या अनुशासन बेमानी हो जाएंगे।"
उन्होंने कहा कि हमारे देश की शिक्षा प्रणाली बहुत चुनौतीपूर्ण दौर में है। प्रधानमंत्री ने कहा कि हमें एक ओर परंपरा और निरंतरता तथा नूतनता और बदलाव में संतुलन कायम करना होगा। शिक्षक होने के नाते आप लोग राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण हैं। आप हमारे देश के सबसे बहुमूल्य राष्ट्रीय संसाधन हैं। हम आपसे अपेक्षा करते हैं कि ज्ञान, सत्य जानने के हमारे बच्चों के संघर्ष और उनमें सम्मानित एवं आत्मसम्मान से भरपूर जीवन बिताने की क्षमता जगाने में आप उनका मार्गदर्शन करें।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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