वेदांता की परियोजना को नहीं मिली मंजूरी, उड़ीसा ने किया विरोध (राउंडअप)
केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्री जयराम रमेश ने संवाददाताओं से कहा, "सक्सेना समिति की रिपोर्ट, वन सलाहकार समिति की सिफारिशों ओर अटार्नी जनरल की कानूनी राय पर विचार किया गया और इसके आधार पर पर्यावरण मंजूरी को वापस ले लिया गया।"
नियामगिरी के जंगलों में वेदांता को खनन की अनुमति खारिज करने का मंत्रालय की वन सलाहकार समिति का फैसला सक्सेना समिति की रिपोर्ट पर आधारित है।
रमेश ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2008 में परियोजना को सैद्धांतिक आधार पर मंजूरी दी गई थी लेकिन सक्सेना समिति की रिपोर्ट में नए मुद्दे आए हैं।
एन.सी.सक्सेना की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञों की एक समिति ने अपनी सिफारिश में कहा कि नियामगिरी पहाड़ियों में वेदांता को खनन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि वन अधिकार कानून के तहत दावों को नहीं सुलझाया गया।
उड़ीसा के जनजातीय लोग और स्वयंसेवी संगठन वेदांता की परियोजना को समाप्त करवाना चाहते हैं। उन्हें लग रहा है कि इससे डोंगरिया कोंध और कुटिया कोंध जनजातियों की संस्कृति खत्म हो जाएगी।
केंद्र द्वारा इस परियोजना को हरी झंडी न दिए जाने का उड़ीसा सरकार ने विरोध किया है। उसका कहना है कि इससे राज्य में औद्योगिकरण प्रभावित होगा।
राज्य के इस्पात और खनन मंत्री रघुनाथ मोहंती ने आईएएनएस को बताया, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वेदांता की परियोजना को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने मंजूरी नहीं दी। हालांकि हमें इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है।"
उन्होंने कहा, "जैसे ही हमें आधिकारिक तौर पर इसकी जानकारी मिलेगी, हम उसकी समीक्षा करेंगे और फिर उचित कार्रवाई करेंगे।"
मोहंती ने कहा, "राज्य सरकार की ओर से इस मामले में कुछ भी गलत नहीं किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय की मंजूरी के बाद हमने इसे मंजूरी दी थी।"
उन्होंने कहा, "परियोजना बहुत आगे बढ़ चुकी है। केंद्र सरकार के इस फैसले से राज्य में औद्योगिकरण पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।"
बहरहाल, इस परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी न दिए जाने की पर्यावरणविदें ने सराहना की है। उनका कहना है कि यह फैसला क्षेत्र की गरीब जनजातीय जनता के पक्ष में है।
दिल्ली स्थित विज्ञान व पर्यावरण केंद्र ने पर्यावरण मंत्रालय के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि वेदांता सभी नियमों की धज्जियां उड़ा रहा था। "यह ऐसा फैसला है जो उड़ीसा के गरीब और पिछड़े लोगों के हक में है। गरीबों को पर्यावरण का लाभ मिलेगा।"
ग्रीन समूह की सुनीता नारायण ने कहा कि यह स्पष्ट था कि परियोजना में पर्यावरण व वन कानूनों का उल्लंघन किया गया था। "यह ग्रीन लॉबी नहीं है, जो विकास का विरोध कर रही है। यह गरीब जनता है जो कह रही है कि विकास शीर्ष पर है लेकिन इसके बावजूद वे गरीब होते जा रहे हैं।"
पर्यावरण मंत्रालय के फैसले को देश के लिए बड़ी सफलता करार देते हुए पर्यावरणविद् बिट्ट सहगल कहते हैं, "यह आम जन की जीत है क्योंकि यदि इस परियोजना को मंजूरी मिल गई होती तो खनन से वनों को बहुत नुकसान पहुंचता। लोगों को तो खामियाजा भुगतना ही पड़ता, इसका प्रभाव शेरों, हाथियों इत्यादि पर पड़ता।"
उड़ीसा के वन्यजीव समाज के बिश्वजीत मोहंती ने खुशी का इजहार करते हुए कहा कि पर्यावरण मंत्रालय ने आखिकार सही कदम उठाया। "वे (वेदांता) कानूनों का हर मोड़ पर उल्लंघन कर रहे थे।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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