परमाणु दायित्व विधेयक के मसौदे को मंत्रिमंडल की मंजूरी (राउंडअप)
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि कैबिनेट ने सुबह परमाणु दायित्व विधेयक पर एक संसद की स्थायी समिति की सिफारिशों को अपनी मंजूरी दे दी।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में समिति की सिफारिशों को मंजूरी दे दी गई, जिसमें रिएक्टर संचालक का दायित्व पहले से तीन गुना बढ़ा कर 1,500 करोड़ रुपये कर दिया गया है। साथ ही दो उपबंधों को जोड़ने के लिए अंतिम समय में 'एंड' शब्द को हटाने का फैसला किया गया। भारतीय जनता पार्टी और वाम दलों ने 'एंड' शब्द के जोड़े जाने पर आपत्ति जताई थी।
ज्ञात हो कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर संसद की 31 सदस्यीय स्थायी समिति ने परमाणु दायित्व विधेयक का परीक्षण करने के बाद बुधवार को अपनी रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश की थी।
सरकार ने उन आरोपों को भी खारिज किया, जिनमें कहा जा रहा है कि प्रस्तावित परमाणु दायित्व विधेयक किसी खास देश को लाभ पहुंचाने के लिहाज से तैयार किया गया है।
चव्हाण ने बताया, "कुछ लोगों ने इस तरह की चिंता व्यक्त की है कि इस विधेयक को किसी खास देश को ध्यान में रख कर या उसे लाभ पहुंचाने के लिहाज से तैयार किया गया है। यह बिल्कुल गलत है। मैं इसे सिरे से खारिज करता हूं।"
चव्हाण ने विधेयक पर राजनीतिक सहमति बनाए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस विधेयक में किसी दुर्घटना की स्थिति में पीड़ितों को मुआवजा देने की बात शामिल है।
समिति ने अपनी सिफारिश में कहा है कि सरकार मुआवजे की सीमा बढ़ा तो सकती है, लेकिन किसी भी परिस्थिति में उसे घटाया नहीं जाना चाहिए। समिति ने पीड़ितों द्वारा दावा किए जाने की समय सीमा को भी पहले से दो गुना बढ़ा कर 20 साल करने की सिफारिश की है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और वाम दलों के नेताओं ने पहले इस विधेयक के संशोधनों का समर्थन किया था लेकिन गुरुवार को उन्होंने उसके एक खण्ड पर आपत्ति खड़ी कर दी। भाजपा ने कहा कि कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने उस वाक्यांश को बदल दिया, जिस पर दोनों पार्टियों के बीच सहमति बनी थी। खण्ड 17(ए) और 17(बी) के बीच 'एंड' (और) शब्द को जोड़ दिया गया है।
भाजपा ने कहा था कि दोनों खण्डों के बीच (एंड) शब्द जोड़ दिए जाने से विधेयक आपूर्तिकर्ता के पक्ष में हो गया है। यानी विदेशी कंपनियों के पक्ष में।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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