भारत, चीन से मुकाबले के लिए ओबामा का शिक्षा पर जोर
ऑस्टिन में टेक्सास विश्वविद्यालय में एक सभा को संबोधित करते हुए ओबामा ने कहा, "बीजिंग से बेंगलुरू तक और सियोल से साओ पाउलो तक नए-नए उद्योग फल फूल रहे हैं। हमारे लिए प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही है।"
उन्होंने कहा, "हमें ऐसी अर्थव्यवस्था की जरूरत है जो अमेरिकियों को भरपूर रोजगार दे सके। इसे तीन शब्दों में कहा जा सकता है मेड इन अमेरिका। क्योंकि हम दूसरे स्थान पर नहीं रहना चाहते। हम संयुक्त राज्य अमेरिका हैं और हम पहले स्थान पर ही रहेंगे।"
शिक्षा को अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण मुद्दा बताते हुए उन्होंने कहा, "हमें वर्ष 2020 तक 80 लाख नए स्नातकों की आवश्यकता है।"
उन्होंने कहा कि स्नातकों की संख्या के मामले में अमेरिका केवल एक पीढ़ी में पहले स्थान से गिरकर 12 स्थान पर आ गया है। यह अस्वीकार्य है और इसे बदला जा सकता है।
ओबामा ने कहा, "पिछले एक दशक में कमजोर आर्थिक नीतियों के चलते हमें कम रोजगार दर, कमजोर आर्थिक विकास, आय में कमी, वेतन में कमी और भारी घाटे का परिणाम मिला है।"
उन्होंने कहा कि देश को ज्यादा सुरक्षित, प्रतिस्पर्धी बनाकर हम रोजगारों और उद्योगों को चीन, भारत और जर्मनी जाने से रोकेंगे।
ओबामा द्वारा भारत को अमेरिकियों के रोजगार छीनने वाले देश के रूप में चित्रित किए जाने वाले इन बयानों पर अमेरिकी विद्वानों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
हेरिटेज फाउंडेशन में एशिया आर्थिक नीति विषय के शोधकर्ता डेरेक सिजर्स ने कहा, "इस तरह के बयान से ओबामा प्रशासन और कांग्रेस अपने साथी लोकतांत्रिक देश को यह संदेश दे रहा है कि जैसा हम चाहते हैं वैसा करो, जैसा हम करते हैं वैसा मत करो।"
हमेशा भारत को अपने व्यापार और निवेश क्षेत्र का उदारीकरण करने के लिए दबाव बनाने वाला अमेरिका अब भारत को आउटसोर्सिग पर तंग कर रहा है। कांग्रेस ने इस मुद्दे को गंदे स्वरूप में परिणत कर दिया है। सिजर्स ने उच्च कौशल युक्त विदेशी कर्मचारियों पर वीजा फीस में वृद्धि किए जाने के फैसले के संदर्भ में यह बात कही।
सिजर्स ने कहा, "यह फैसला कुछ भारतीय कंपनियों का अमेरिका में प्रवेश बाधित करने के लिए किया गया है।"
उन्होंने कहा कि इस संदेश से अमेरिका की विदेश नीति और अर्थव्यवस्था दोनों पर बुरा असर पड़ेगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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