संसद में बहस, 'फिर भी महंगाई डायन खाय जात है'
नई दिल्ली, 8 अगस्त (आईएएनएस)। संसद के मानसून सत्र का पहला सप्ताह महंगाई के मुद्दे पर हंगामे की भेंट चढ़ गया तो दूसरे सप्ताह में इसे लेकर लोकसभा और राज्यसभा में बहस हुई लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। महंगाई 'ज्यों की त्यों' बनी हुई है। इससे कराह रही जनता अब कह रही है, 'फिर भी महंगाई डायन खाय जात है।'
मानसून सत्र के दूसरे सप्ताह में सत्ता पक्ष और विपक्ष में महंगाई के मुद्दे पर चर्चा कराने को लेकर सहमति बनी या यूं कहें कि समझौता हो गया। इससे पहले तक लोकसभा में काम रोको प्रस्ताव या नियम 184 के तहत मतदान वाले प्रावधानों के तहत चर्चा कराने की मांग पर अड़ा विपक्ष बगैर मतदान के ही चर्चा कराने को लेकर तैयार हो गया।
सरकार के लोग भी सीना ताने इस मद में चूर दिखे कि वह विपक्ष को मनाने में सफल रहे और मतदान से बच गए। सरकार ने भी कोई ठोस कदम उठाए जाने की घोषणा से परहेज करते हुए और आंकड़ों की बाजीगरी दिखाते हुए अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी देकर विपक्ष और महंगाई से पल्ला छुड़ा लिया।
एक सप्ताह तक महंगाई को लेकर विपक्ष और सरकार के बीच जारी गतिरोध से जनता को महंगाई रूपी डायन से कोई राहत नहीं मिली। दो जून की रोटी के लिए अब भी वह मशक्कत ही करती रहेगी। भले ही सरकारी गोदामों में अनाज सड़ रहे हों या उन्हें चूहे खा रहे हों।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव प्रकाश करात ने सरकार के इस रुख पर इसलिए चुटकी लेते हुए विजयवाड़ा में पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक के अपने उद्घाटन संबोधन में कहा कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने अनाज भंडारों को सड़ने के लिए छोड़कर चूहों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर दी है। "भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदामों में छह करोड़ टन अनाज है। गोदामों में क्षमता से अधिक अनाज है और सड़ रहा है। वे चूहों की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित कर रहे हैं।"
मानसून सत्र के पहले दो सप्ताह में जहां विपक्षी दलों में जबरदस्त एकता दिखी वहीं सरकारी पक्ष सदन के प्रबंधन के मामले में असफल रहा। इस दौरान समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से लेकर वामपंथी दलों तक ने विपक्ष का साथ दिया।
विपक्ष की यह एकता आगे भी जारी रहने के प्रबल आसार दिख रहे हैं क्योंकि राष्ट्रमंडल खेलों में अनियमितताओं संबंधी रोजाना हो रहे खुलासे पर चर्चा के लिए विपक्षी दलों ने सरकार को घेरने की पूरी तैयारी कर ली है। भाजपा इस मुद्दे पर नियम 193 के अधीन चर्चा चाहती है। इस मामले में वह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कम में किसी से भी स्पष्टीकरण नहीं चाहती।
पार्टी के एक नेता ने बताया कि चूंकि राष्ट्रमंडल खेलों से खेल मंत्रालय के अलावा शहरी विकास मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और अन्य मंत्रालय भी जुड़े हुए हैं इसलिए इससे जुड़े पूरे आयामों पर किसी एक मंत्री की बजाए प्रधानमंत्री का जवाब बेहतर होगा।
अलबत्ता राष्ट्रमंडल खेलों में जनता के पैसों से हो रही तथा हुई कथित अनियमितताओं पर संसद में अगले सप्ताह फिर हंगामा होगा और एक बार फिर सरकार और विपक्षी दलों में कुछ ऐसी गुटरगूं होगी कि जनता बेचारी पिसती ही रहेगी। उसे तो यूं भी हर हाल में पिसना ही है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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