मारे गए नक्सल समर्थक के परिजनों का भविष्य अंधकारमय
सब्यसाची रॉय
लालगढ़, 8 अगस्त (आईएएनएस)। घास-फूस की एक जीर्ण झोपड़ी में किसी तरह अपना जीवन काट रहा है एक परिवार। यह परिवार है नक्सल समर्थक लालमोहन तुडू का, जिसे पुलिस ने 23 फरवरी को एक मुठभेड़ में मार गिराया था। अब इस परिवार का भविष्य क्या है, इसे खुद भी पता नहीं। तुडू की मां धामोनी सवाल करती है, "क्या सरकार ने मेरे बेटे की हत्या कर नक्सलियों का सफाया कर दिया?"
तुडू नक्सल समर्थक संगठन, पुलिस संत्रास विरोधी जनसाधारण समिति (पीसीएपीए) का प्रमुख था।
तुडू के दो बेटे लिएंडर (13) और भूपति (10) तथा बड़ी बेटी ललिता (16) को पता नहीं है कि उनके पिता क्यों मर गए। ये बच्चे यह नहीं जानते कि क्या उन्हें अपने पिता की कही बात पर विश्वास करना चाहिए या पुलिस जो दावा करती है, उस पर।
तुडू की ही तरह मारे गए अन्य नक्सली नेताओं के परिजन भी इस क्षेत्र में अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
एक व्यक्ति ने कहा कि आंसू ही उनका एक मात्र साथी है।
लिएंडर ने कहा, "हमारे पिताजी ने कहा था कि वह जनजातियों के अधिकारों की हिफाजत के लिए लड़ रहे हैं। लेकिन पुलिस दावा करती है कि हमारे पिता ने राष्ट्र के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया था।"
ललिता अपनी बोर्ड की परीक्षा में पहले दिन हिस्सा ले पाई थी, उसी दिन उसके पिता की घर से कुछ ही दूरी पर हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने मुठभेड़ का दावा किया था। उसके बाद ललिता बोर्ड की परीक्षा में फेल हो गई।
आईएएनएस ने जब ललिता से पूछा कि क्या वह अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती है, ललिता चुप रही। वह इधर-उधर देखती रही और उसकी आंखों से आंसू झरने लगे।
लालमोहन तुडू की विधवा लखिमोनी ने कहा कि उसके पति ने नक्सलियों के साथ शामिल न होने के उसके निवेदन को मानने से इंकार कर दिया था।
लाखिमोनी ने आईएएनएस से कहा, "यदि उन्होंने हमारी सुनी होती, तो वह अभी मरे न होते। हमने उन्हें समझाने की कोशिश की कि वह नक्सलियों के साथ न जुड़ें, लेकिन पुलिस द्वारा उत्पीड़ित महिलाओं की पीड़ा से वह व्यथित थे।"
पीसीएपीए के प्रमुख की हत्या से उसके परिवार के लोग इतने डर गए थे कि उन्होंने शव तक के लिए प्रशासन से संपर्क नहीं किया। लखिमोनी ने कहा, "हम डरे हुए थे।"
तुडू की मौत के बाद उसका परिवार बु़री तरह आर्थिक संकट में है। उसकी विधवा अपनी जमीन नहीं जोत पा रही है।
लखिमोनी ने कहा, "ललिता ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी है। बेटों की पढ़ाई में रुचि नहीं रह गई है। वे महसूस करते हैं कि मैं उनकी पढ़ाई का खर्च और परिवार का खर्च नहीं उठा सकती।"
एक नक्सली दस्ते के डिप्टी कमांडर बिश्वनाथ मुर्मू उर्फ अर्जुन के घर की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। एक जंगल के पास एक गांव में 16 जून को पुलिस की गोलीबारी में मारे गए आठ नक्सलियों में मुर्मू भी एक था।
अर्जुन की मां तुषू ने कहा कि उसके बेटे के अंदर 2001 में पुलिस के खिलाफ उस समय घृणा पैदा हुई थी, जब चितबनघर गांव में पास के एक शिविर के पुलिस कर्मियों ने स्थानीय लोगों को कथित रूप से प्रताड़ित किया था। वर्ष 2009 में वह घर से भाग गया और बदला लेने के लिए नक्सलियों के साथ जुड़ गया।
तुषू (46) के लिए अब जीवन एक चुनौती बन गया है। प्रति दिन पेड़ों के पत्ते जुटाना, घर का काम करना और बीमार पति व एक छोटे बेटे की देखभाल करना उसकी दिनचर्या बन गई है।
चपसोल निवासी सुदन तुडू अपने भाई के मौत के दुख से अभी तक नहीं उबर पाया है। वह अलू तुडू (18) उर्फ कामरेड गंगा का बड़ा भाई है। गंगा को भी दुली गांव में मार डाला गया था। सुदन कहता है, "अब हमारे साथ कोई नहीं है। हमें खुद से अपने को बचाना है।"
पश्चिम मिदनापुर के जिला मजिस्ट्रेट एस.निगम ने कहा, "नक्सलियों के परिवार के लिए किसी तरह का पैकेज नहीं है। यदि कोई हमसे मदद के लिए संपर्क करता है, तो हम उसके लिए कुछ बंदोबस्त करने हेतु सरकार को सूचित करेंगे।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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