अराजकता की गिरफ्त में जम्मू एवं कश्मीर : आडवाणी
जम्मू एवं कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म करने की भाजपा की सबसे पुरानी मांगों में से एक को मौजूदा परिप्रेक्ष्य में फिर से उठाते हुए आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर किए एक ताजा पोस्ट में कहा कि इसे समाप्त किया जाना चाहिए क्योंकि यह देश की मनोवैज्ञानिक एकता में सबसे बड़ी बाधा है।
विरोधी दलों द्वारा अपनी इस मांग को सांप्रदायिकता से जोड़े जाने पर आश्चर्य जताते हुए उन्होंने कहा, "यदि कोई हमारे रुख और तर्को पर विवाद करते हुए असहमति प्रकट करता है तो समझ आ सकता है लेकिन मुझे तब आश्चर्य होता है कि जब भाजपा की अनुच्छेद 370 को समाप्त करने की मांग को साम्प्रदायिकता के सबूत के रूप में देखा जाता है।"
आडवाणी ने राबर्ट लुईस स्टैवनसन की लैटिन भाषा में लिखित पुस्तक 'विरजिनीबस प्युइरिसिक्यु' का हवाला देते हुए कहा, "मानव एक ऐसा प्राणी है जो सिर्फ रोटी के सहारे नहीं रहता, बल्कि मुख्यतया जुमलों के सहारे रहता है। एक ऐसा ही जुमला है 'साम्प्रदायिक' जिसका भारतीय राजनीतिज्ञ बहुधा अपनी सुविधा और स्वार्थानुसार उपयोग करते हैं। समय के साथ-साथ यह भारतीय राजनीतिक व्यवहार में घिनौने दुर्वचन का शब्द बन गया जिसका कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी कभी-कभी श्यामा प्रसाद मुखर्जी और भारतीय जनसंघ के लिए करते थे। आज यह एक विशेषण के तौर पर भाजपा को लांछित करने के लिए किया जाता है।"
जम्मू एवं कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत विशेष राज्य का दर्जा देने को अंतरिम समझौते की संज्ञा देते हुए आडवाणी ने कहा कि पाकिस्तान का आक्रमण और संयुक्त राष्ट्र का पहलू इसके पीछे था। इस अनुच्छेद का इस तथ्य से कोई लेना देना नहीं है कि जम्मू एवं कश्मीर एक मुस्लिम बहुल राज्य है, जैसाकि आज हमारी मांग की आलोचना करते हुए तर्क दिया जाता है।
आडवाणी के मुताबिक प्रसिद्ध कानूनविद तथा पूर्व शिक्षा मंत्री मोहम्मेदाली करीम छागला द्वारा 24 फरवरी 1964 को राज्यसभा में दिए गए एक भाषण में कहा था, "पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि अनुच्छेद 370 का धीरे-धीरे क्षरण हो रहा है। यह क्षरण तेजी से होने की उम्मीद है और आशा है कि यह अनुच्छेद हमारे संविधान से अदृश्य हो जाएगा। आखिरकार यह संक्रमणकालीन और अस्थायी है। यह संक्रमणकालीन अवधि काफी लंबी हो चुकी है।"
आडवाणी ने कहा, "कश्मीर अभी भी विवादास्पद मुद्दा है। छागला द्वारा की गई टिप्पणी को भी 46 वर्ष बीत चुके हैं। यह संक्रमणकालीन अवधि अभी तक समाप्त नहीं हुई है। आज यदि कोई छागला सुझाए कि यह अस्थायी अनुच्छेद समाप्त किया जाए तो यह खतरा बना रहेगा कि उसे साम्प्रदायिक और प्रतिक्रियावादी नाम न दे दिया जाए।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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