आवाज मेरी शब्द मुलायम के : अमर सिंह

सपा से निष्कासित सिंह ने अपने ब्लॉग पर लिखा कि बोलना और डोलना संन्यासी और राजनेता का कर्म-धर्म है। प्रश्न यह है कि बोलें क्या और डोलें कहां? क्षेत्रीय दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में मेरा बोलना काफी विवादों की जड़ बना। कौन मानेगा कि ओंठ मेरे थे लेकिन बोल मेरे तब के मालिक के। राज्यसभा सांसद ने दार्शनिक अंदाज में कहा कि दिल किसे दिखता है लोग तो चेहरा देखते और पढ़ते हैं। इसे लोग अवधारणा बना लेते हैं जो बाद में सत्य बनकर आपको अनंतकाल तक घेरे रखता है।
उन्होंने कहा कि आज के गृहमंत्री जब वित्त मंत्री थे उस समय दल की तरफ से उन पर हमला करने का आदेश हुआ, मैं सिपाही क्या करता? अब वह गृहमंत्री हैं और उनके दो अनन्य घनिष्ठ मेरे भी घनिष्ठ है। उनके माध्यम से मुझे लगता है कि बाणों से अधिक शब्दों के तीर घातक होते हैं।
माफी मांगने के अंदाज में अमर ने लिखा कि वाणी को विराम तथा शब्द वही उच्चारित हों जो वापस ना लेने पड़ें। राजनीतिक उत्तरदायित्व के निर्वहन की प्रक्रिया में मेरे द्वारा अब तक हुए आचरण के लिए मैं सार्वजनिक खेद व्यक्त कर इतना ही कहूंगा कि चुप्पी सोना और बोलना चांदी। राजनीतिक जीवन के सफर में पर्टियां बदलने पर उन्होंने फर्माया, बचपन, जवानी, बुढ़ापे की तरह जीवन का कर्म चक्र भी बदलता है। कांग्रेस, समाजवादी, लोकमंच..अरे अभी तो आगाज है, मेरे अंजाम का तो पता मुझे खुद भी नहीं है।












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