शिक्षा नियामक को अदालत ने लगाई फटकार (लीड-1)
एनसीटीई की यह आलोचना तब की गई जब इसके सदस्य सचिव हसिब अहमद ने अदालत से कहा कि नियामक ने निजी संस्थाओं को आगे किसी भी तरह की मान्यता देने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है।
अदालत का कहना था, "विनियमन और निषेध के बीच एक अंतर है।"
न्यायाधीश जी.एस. सिंघवी और न्यायाधीश अशोक कुमार गांगुली ने कहा, "प्रतिबंध का मतलब है कि आपका विनियामक प्राधिकरण विफल रहा है। यह आप पर एक कमजोर टिप्पणी है। आपका अस्तित्व नहीं होना चाहिए।"
अदालत ने कहा कि किसी भी क्षेत्र में शिक्षा का नियमन करने वाली एजेंसियों का यदि यह हाल है तो ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सेवानिवृत्त नौकरशाहों से भरी हुई हैं, जिनके पास शिक्षा के प्रसार की कोई दृष्टि नहीं है।
अदालत ने अहमद से यह भी पूछा कि एनसीटीई में कितने सेवानिवृत्त नौकरशाह हैं।
अदालत ने कहा कि भारत को छोड़कर दुनिया भर में कहीं भी ऐसा नहीं है कि सेवानिवृत्त नौकरशाह शिक्षा के विनियमन के लिए गठित एजेंसियों की शोभा बढ़ा रहे हों।
अदालत ने कहा कि नौकरशाहों में समझौते की प्रवृत्ति होती है और इससे शिक्षा प्रणाली प्रभावित होती है।
अहमद मंगलवार को अदालत के समक्ष यह बताने के लिए पेश हुए थे कि एनसीटीई ने एनसीटीई विधेयक, 1993 का उल्लंघन करते हुए मध्य प्रदेश के निजी बी.एड. कॉलेजों को मान्यता देने वाले पश्चिमी क्षेत्रीय समिति के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक के खिलाफ क्या कदम उठाए थे।
अदालत ने मध्य प्रदेश के शिक्षा सचिव से 10 दिन के अंदर राज्य के छह विश्वविद्यालयों से संबद्ध बी.एड. और एम.एड. कराने वाले कॉलेजों की एक सूची देने के लिए भी कहा है।
अदालत ने बरकतुल्ला विश्वविद्यालय को भी उससे संबद्ध कॉलेजों की सूची देने के लिए कहा है।
निजी कॉलेजों द्वारा दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने ये दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
राज्य के सात विश्वविद्यालयों से संबद्ध निजी कॉलेज शैक्षणिक सत्र 2007-08 के दौरान दाखिला लेने वाले छात्रों के परीक्षा परिणाम घोषित करने के लिए उन्हें दिशा-निर्देश देने की मांग कर रहे थे।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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