आखिर क्यों उड़ गई भाजपा की रंगत?

ताजा मसला उद्योगपति विजय माल्या को लेकर उठा है। दर असल बीजेपी कर्नाटक में तीसरी सीट के लिए जरूरी समीकरण न बनने के कारण अब वह वहां पर उद्योगपति विजय माल्या का समर्थन करने का मन बना रही है। और राजस्थान में संतोष बागरोडिया जिनको की कांग्रेस का समर्थन प्राप्त है, के मैदान में उतर आने से बीजेपी के उम्मीदवार राम जेठमलानी की जीत मुश्किल में पड़ गई है । जिससे दोनों ही राज्यों में बीजेपी की परेशानी शबाब पर है क्योंकि इसकी वजह विरोधीगण कम उसके पार्टी के लोग ज्यादा है, क्योंकि पार्टी के कुछ सदस्य नहीं चाहते कि बीजेपी माल्या और जोठमलानी को टिकट दिये जायें ।
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इन दिनों भाजपा बेचारी हो गई है। क्योंकि आज पार्टी में हर कोई अपने आप को पार्टी का सिरमौर समझने लगा है। पार्टी के लोगों का रूख अपने ही लोगों के प्रति काफी रूखा हो गया है। जिस के कारण उसे समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अपने जरूरी विधायकों की संख्या वाली सीटें मिलने में तो उसे कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन जहां पर कुछ और विधायकों की जरूरत हैं, वहां पर उन्हें जुटाने की भाजपा की रणनीति गड़बड़ा रही है।
कर्नाटक में भाजपा की दो सीटें आना तय हैं, लेकिन तीसरी सीट के लिए उसके पास पर्याप्त विधायक नहीं हैं। विधानसभा के समीकरणों में तीसरी सीट के लिए जद की भूमिका महत्वपूर्ण है। उसके वोटों के सहारे ही भाजपा या कांग्रेस अपना उम्मीदवार जिता सकती है। ऐसे में इस सीट के लिए भाजपा पूर्व सांसद उद्योगपति विजय माल्या का समर्थन करने के मूड में हैं।
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राजस्थान में भाजपा ने राम जेठमलानी को अपने दूसरे उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतार तो दिया है, लेकिन इसके लिए जरूरी अतिरिक्त तीन वोट हासिल करना समस्या बनता जा रहा है। भाजपा की एक सीट निकलने के बाद दूसरी सीट के लिए 37 विधायक बचते हैं, जबकि जरूरत 41 विधायकों की है। इसमें जद के एक विधायक को शामिल करने के बाद संख्या 38 हो जाती है।
किरोड़ीलाल मीणा के पास 2 विधायक हैं उनके समर्थन के बाद भी एक और विधायक की जरूरत होगी। यह काम मुश्किल तो नहीं हैं, लेकिन जेठमलानी को लेकर भाजपा में नाराजगी जो है और किरोड़ी लाल मीणा ने जेठमलानी को लेकर जो रुख दिखाया है, उससे भाजपा की पेशानी पर बल आ गए हैं। झारखंड में भी भाजपा ने नंबर कम होने के बावजूद अजय मारू को मैदान में उतारा है, लेकिन जोड़-तोड़ और धन बल की भूमिका को देखते हुए वहां भी समस्या आ रही है।
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कभी लखनऊ के मंच से भाजपा प्रमुख और देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा था कि देश की राजनीति को गंदा करने वाले देश को उद्दोगपति ही है, क्योंकि उनके लिए सिर्फ पैसा ही मायने रखता है,उनका धर्म और ईमान सिर्फ पैसा ही है। बाजार में सामान बेचते बेचते वो राजनीति में भी खरीद-फरोख्त शुरू कर देते हैं। इसलिए मैं इस बात का पुर जोर विरोध करते हुए कहता हूं कि कारोबारियों को राजनीति के दंगल में नहीं उतरना चाहिए।
अब आप बताइये इस तरह के उसूलों वाली भाजपा फिर आज क्यों विजया माल्या के पक्ष में आ खड़ी हुई है, क्या यह समीकरण ये नहीं दर्शाते की बीजेपी की हालत दयनीय हो चुकी है, आज वो अपने ही सिद्धातों से भटक चुकी है। क्या हालात और सत्ता की लालच ने भाजपा को अपने ही मुद्दों और विचारों से दूर ला दिया है। जिससे आम आदमी सोचने को मजबूर है कि वाकई में भगवा की रंगत उड़ गई है!












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