भोपाल गैस: न्‍यायपालिका ने किया शर्मसार

Bhopal Gas Tragedy
दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी भोपाल गैस कांड का फैसला भी किसी त्रासदी से कम नहीं है। 25 साल के लंबे इंतजार के बाद आए इस फैसले ने पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाने के बजाए नमक छिड़कने का काम किया है।

भोपाल गैस कांड पर सोमवार को आए फैसले में अदालत ने आठ दोषियों को 2-2 साल की सजा सुनाई थी और एक- एक लाख का जुर्माना लगाया था। मगर कुछ ही देर में 25,000 के मुचलके पर दोषियों को जमानत भी मिल गई है।

साफतौर पर ये फैसला, फैसला कम और मजाक ज्यादा लगता है। भोपाल गैस कांड एक ऐसी त्रासदी है जिससे आज भी लोग मर रहे हैं, मगर अदालत के इस फैसले ने पीड़ितों की रही सही उम्मीदों पर भी मिट्टी डाल दी।

भोपाल के हजारों लोगों को मौत की नींद सुलाने वाली कंपनी यूनियन कारबाईड अमेरिकी कंपनी थी, उसका मालिक वारेन एंडरन न्यूयार्क में आराम की जिंदगी जी रहा है। भारत सरकार उसे अमेरिका के मजबूत हाथों से वापस लाने में असफल रही। एंडरसन को वापस देश लाने की भारत की अपील अमेरिका ने 2003 में ठुकरा दी थी। उस समय यूनियन कारबाईड के चैयरमान केशुभाई महिंद्रा आज मंहिद्र एण्ड महिंद्रा के चैयरमैन हैं।

ऐसे फैसले से लगता है जनता का कानून के ऊपर से विश्वास उठ जाएगा। ऐसे और भी मामले हैं जिन पर आए फैसले न्याय की आस नहीं जगाते बल्कि न्यायपालिका को सवालों के कठघरे में खड़ा करती है।

नोएडा का निठारी नरसंहार किसे याद नहीं होगा। जिसमें मुख्य आरोपी मोनिंदर पंढेर को अदालत ने बरी कर दिया, रुचिका मामले में आरोपी राठौड़ को सिर्फ दो साल की सजा दी गई, 2002 में ससंद पर हमले का आरोपी अफजल गुरु को फांसी मिलने के बावजूद दिल्ली सरकार ने ये मामला लटका रखा है।

कसाब को भी फांसी के फंदे तक पहुंचने में अभी सालों लगेंगे और ऐसे मामलों की तो गिनती ही नहीं जो अदालत में लंबित पड़े हैं। अब आप ही बताएं देश की न्‍यायपालिका किस दिशा में जा रही है। जिस प्रकार के फैसले अदालत कर रही है, क्‍या आप उससे संतुष्‍ट हैं? अपने जवाब नीचे दिए गए कमेंट बॉक्‍स में लिखें।

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