गैस पीड़ितों को 'इस सजा' का गुमान ही न था

भोपाल, 8 जून (आईएएनएस)। मुती बाग में रहने वाले इस्माइल शेख यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि हजारों लोगों की मौत के गुनहगारों को सिर्फ दो साल की ही सजा क्यों मिली है। सिर्फ इस्माइल ही नहीं न जाने उनके जैसे कितने गैस पीड़ित हैं जिन्हें इस बात का गुमान ही न था कि सजा मिलेगी और वह भी दो साल तथा एक लाख रुपये जुर्माने की। वे आस तो लगाए थे कि सात जून को न्यायालय ऐसी सजा सुनाएगा, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो होगा।

यूनियन कार्बाइड कारखाने से दो-तीन दिसम्बर 1984 की रात रिसी विषैली गैस मिथाइल आइसो सायनाइट ने लगभग 3200 लोगों को मौत की नींद सुला दिया था, जबकि हजारों लोगों को मौत की राह पर लाकर खड़ा कर दिया था। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि अब तक 15 हजार से ज्यादा लोग मर चुके है और पांच लाख से ज्यादा अब भी गैस कांड से मिली बीमारी का दंश झेल रहे हैं।

हादसे के तीन साल बाद 1987 से शुरू हुई हक की लड़ाई का जो बड़ा फैसला सोमवार को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मोहन पी. तिवारी की अदालत ने सुनाया, उससे पीड़ितों को राहत कम मिली बल्कि वे हादसे से मिली त्रासदी से कहीं ज्यादा आहत हैं।

गैस हादसे की 23 साल तक चली सुनवाई के बाद आए फैसले में दोषी ठहराए गए आठ में से सात को दो-दो साल की सजा सुनाई गई है और प्रत्येक पर 1,01,750 रुपये का जुर्माना लगाया गया है जबकि कंपनी यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड पर 5,01,750 रुपये का जुर्माना लगाया गया है। बाद में इसी अदालत ने सभी आरोपियों को 25-25 हजार रुपये के मुचलके और इतनी ही राशि की व्यक्तिगत जमानत पर रिहा कर दिया।

यूनियन कार्बाइड कारखाने के आस पास की बस्तियों में अजीब सी मायूसी छाई हुई है। वे पिछले 23 साल से सीजेएम के न्यायालय में चल रहे मामले से बड़ी उम्मीद लगाए बैठे थे। उन्हें यह पता ही न था कि धारा 304 ए (लापरवाही) का जो मामला दर्ज किया गया है उसमें अधिकतम सजा दो साल की है।

यूनियन कार्बाइड कारखाने के ठीक सामने बसी जेपी नगर बस्ती की कमला बाई कहती हैं कि वह इस फैसले पर खुशी मनाएं या रोएं, उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा है। यह कैसा फैसला है, जब एक व्यक्ति दूसरे की हत्या करता है तो उसे आजीवन कारावास की सजा मिलती है और जो हजारों लोगों की मौत के जिम्मेदार हैं उन्हें मात्र दो साल की सजा मिली है। अब वह सोच रही है कि आखिर यह फैसला सुनाया ही क्यों गया।

इसी इलाके के इदरीस खान कहते हैं कि उन्हें इस फैसले में कुछ शक की बू आती है। वह सवाल करते हैं जो लोग हजारों लोगों की मौत के जिम्मेदार हैं उन्हें सिर्फ दो साल की सजा क्यों सुनाई गई। क्या और कोई इस तरह का गुनाह करता तो उसे भी यही सजा सुनाई जाती। गैस पीड़ितों में फैसले के खिलाफ गुस्सा और रोष बना हुआ है। वे यह जान ही नहीं पा रहे हैं कि यह फैसला न्यायालय ने कैसे सुनाया।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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