फांसी की सजा में देरी का मतलब सजा कम करना है

राणा अजीत

नई दिल्ली, 30 मई (आईएएनएस)। सरकार संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु सहित फांसी की सजा पाए अन्य दोषियों की रहम संबंधी याचिका की सुनवाई में देरी कर संभवत: अनजाने में ही उन्हें आजीवन कारावास की सजा का हकदार बनाती जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के फैसले भी इसी ओर इंगित करते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय अक्सर इस बात पर जोर देता रहा है कि फांसी की सजा प्राप्त मुजरिमों को फांसी देने में अत्यधिक देरी से उस पर अमानवीय प्रभाव पड़ता है, क्योंकि वह फांसी होने और बच जाने की उम्मीदों के बीच झूलता रहता है। ऐसे में वह आजीवन कारावास के रूप में कम कठोर सजा पाने का हकदार बन जाता है।

इस बात का महत्व इस तथ्य से और भी बढ़ जाता है कि अफजल ने हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाकर अपनी रहम संबंधी याचिका के जल्द निपटारे की मांग की है।

सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल के निवासी विवियन रोड्रिक्स की एक याचिका पर 1971 में फैसला दिया था, "हमें ऐसा लगता है कि फांसी की सजा में अत्यधिक देरी अपने आप में सजा को उम्रकैद में बदलने के लिए पर्याप्त है।"

रोड्रिक्स को 1962 में हत्या के एक मामले में 1964 में मौत की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने कहा था, "यह 1971 का जनवरी महीना आ गया है। मुजरिम छह साल से मौत के खौफ में जी रहा है। इससे वह मानसिक रूप से बहुत ही परेशान हुआ होगा। हमारे विचार में रहम की याचिका पर फैसला लेने में देरी से उस पर हो रही मानसिक प्रताड़ना अमानवीय है। हम समझते हैं कि उसकी सजा को उम्र कैद में बदलने के लिए यह उपयुक्त मामला है।"

इसी तरह वर्ष 1982 में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक फैसले के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक मुजरिम को मिली फांसी की सजा को देरी के चलते टाल दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी की सजा को उम्र कैद में तब्दील करते हुए कहा, "घटना 1972 की है और तब से अब तक आठ वर्ष से ज्यादा गुजर चुके हैं। वर्तमान याचिका पांच साल से लंबित है। हम समझते हैं कि अपराधी ने हत्या का जो अपराध किया है वह बहुत ही जघन्य है। इसके बावजूद इस विशेष मामले में मौजूद परिस्थितियों में मौत की सजा उचित नहीं है।"

सर्वोच्च न्यायालय ने इससे पहले फांसी की सजा को दो से चार साल के भीतर क्रियान्वित करने की लगभग समय सीमा तय की थी। दो साल से अधिक समय होने पर फांसी की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया जाता था।

वर्ष 1983 में सर्वोच्च न्यायलय ने दो साल के भीतर मृत्युदंड देने संबंधी इस नियम को कुछ लचीला बना दिया लेकिन इस बात पर जोर दिया कि मृत्युदंड के क्रियान्वयन में होने वाली अत्यधिक देरी को दोषी की फांसी की सजा आजीवन कारावास में बदली जा सकती है।

शेर सिंह बनाम पंजाब सरकार के एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था, "वैकल्पिक उम्मीदों के अभाव में लंबी वेदना और अनिश्चितता को लेकर गुस्से के कारण सजायाफ्ता मुजरिमों के मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को देखते हुए फांसी की सजा का क्रियान्वयन विशेष मामलों में अमानवीय है और यह सजा की महत्ता को कम करता है।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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