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थरूर विवाद चिदंबरम के 18 वर्ष पहले मामले के समान

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    अरविंद पद्मनाभन

    नई दिल्ली, 19 अप्रैल (आईएएनएस)। शशि थरूर के विदेश राज्य मंत्री पद से इस्तीफा देने से केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम के 18 वर्ष पहले वाणिज्य मंत्रालय छोड़ने की घटना की याद ताजा हो जाती है।

    उस समय बदनाम शेयर दलाल हर्षद मेहता के नजदीकी सहयोगी बैंकर बिलगी रत्नाकर द्वारा प्रवर्तित फेयरग्रोथ फाइनेंसियल सर्विसिज में चिदंबरम की पत्नी नलिनि के कथित निवेश का मामला उठा था।

    थरूर के मामले में विवाद उनकी मित्र सुनंदा पुष्कर को इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की कोच्चि फ्रेंचाइजी में मुफ्त हिस्सेदारी देने से पैदा हुआ और मंत्री पर नीलामी प्रक्रिया में शामिल कागजी कार्रवाई को तेज करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगा।

    दोनों मामलों को देखा जाए तो चिदंबरम ने बिना किसी शीर्ष नेता के कहे अपना इस्तीफा सौंप दिया था जबकि थरूर मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हस्तक्षेप करना पड़ा।

    दोनों मामलों में संदेहास्पद स्थितियों में हिस्सेदारी जारी करने का मामला था।

    चिदंबरम मामले में यह आरोप था कि उनके परिवार ने प्र्वतकों के कोटे से बाहर 10 रुपये की फेस वैल्यू पर 10,000 शेयर हासिल किए थे, जबकि उनकी कीमत काफी अधिक थी।

    चिदंबरम को उस मामले से बेदाग बच निकलने में जिस व्यक्ति ने मदद की थी वह इस समय राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष, एक वकील और भारतीय जनता पार्टी के नेता अरुण जेटली हैं।

    तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिम्हा राव ने वर्ष 1995 में चिदंबरम को मंत्रिमंडल में दोबारा शामिल किया। उस समय मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे।

    जेटली ने दिल्ली उच्च न्यायालय में चिदंबरम का सफल बचाव किया और अदालत ने जनता पार्टी की याचिका खारिज कर दी, जिसमें कथित अनियमितताओं की केंद्रीय जांच ब्यूरो से जांच की मांग की गई थी।

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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