एक राजनीतिक क़दम या कुछ और....

हारून रशीद
बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
क्या वो भी राजनीति में आने की तैयारियाँ कर रही हैं? क्या वो इसी उद्देश्य के लिए अपना रास्ता बना रही हैं? क्या वो भी पाकिस्तान में पारंपरिक पारिवारिक राजनीति का एक नया मोड़ बनेंगी?
इन सारे सवालों के जवाब मुर्तज़ा भुट्टो की बेटी फ़ातिमा भुट्टों की पहली राजनीतिक किताब में नहीं मिलते हैं.
अभी उनकी माँ ग़ेनवा भुट्टो अगर राजनीतिक मैदान में काफ़ी दौड़ धूप के बाद थकी-थकी और ख़ामोश हैं लेकिन उनके पिता असली राजनीतिक उत्तराधिकारी शायद उनके छोटे भाई ज़ुल्फ़िक़ार जूनियर हों.
फ़ातिमा ने जान बूझ कर ये कार्ड शायद इसीलिए अपने सीने से लगा रखा है या फिर ये सारे प्रश्न समय से पहले ही उठने लगे हैं.
पाकिस्तान के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टों की पोती और मीर मुर्तज़ा की बेटी फ़ातिमा भुट्टो के अपने संस्मरण और इंटरव्यू पर आधारित 'लहू और तलवार के गीत एक बेटी की यादें' के नाम से लिखी किताब कई कारणों से दिलचस्प है.
इस किताब में कई बातों पर से पर्दा उठता है जो कि उस ख़ानदान के अंदर खिंचाव और आने वाले समय का पता देती है.
किताब के शुरू में ही फ़ातिमा ने बड़े ढंग से अपनी निजी पसंद और नापसंद को स्पष्ट करते हुए अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी सुनिश्चित कर दिया है.
पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के लिए उनके पास कोई अच्छी बातें लिखने को नहीं थीं और इस नापसंदगी की पृष्टभूमि ज़्यादातर राजनीतिक है. यह भूतकाल में भी काफ़ी पीछे तक नज़र आती है.
मीर मुर्तज़ा भुट्टो ने 1988 के चुनाव में ज़रदारी को लियारी से पार्टी टिकट देने का कड़ा विरोध किया था लेकिन उनकी बहन ने उनकी एक न सुनी थी.
ये राष्ट्रपति ही थे जिन्होंने मीर मुर्तज़ा भुट्टो की मौत की ख़बर एक परेशान फ़ातिमा को टेलिफ़ोन पर सुनाई थी.
शायद इसी कारण उन्होंने आसिफ़ ज़रदारी के बारे में लिखा है कि वे 'ख़ानदान के एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें कोई भी पसंद नहीं करता था.'
इस किताब में आलोचना का निशाना सिर्फ़ ज़रदारी ही नहीं बेनज़ीर भुट्टो भी रही हैं. उनपर आलोचना मीर मुर्तज़ा को देश वापस लौटने से मना करने और शाहनवाज़ भुट्टो की हत्या का मुक़दमा दोबारा न खोलने के कारण की गई है.
लेकिन आजकल ख़ुद पश्चिम में रहने वाली फ़ातिमा भुट्टो ने अपनी किताब में एक नई परिकल्पना अपने पिता और चचा के मारे जाने की की है.
इशारों और संकेतों में बात करते हुए उनका ख़्याल शायद ये है कि उनकी फूफी बेनज़ीर भुट्टो पश्चिम की आंखों का तारा थीं जबकि उनके पिता और चचा कभी पश्चिम के चाहने वालों में नहीं रहे.
ये बात इस हद तक तो सच है कि शाहनवाज़ और मुर्तज़ा भुट्टो ने अपने निर्वासन के दौरान कभी अमरीका और ब्रितानिया में लंबे समय तक नहीं रहने के बारे में नहीं सोचा.
बहरहाल भुट्टो बंधु शाहनवाज़ के जीवन के अंतिम दिनों में फ़्रांस में ज़रूर ठहरे थे.
किताब लिखने वाला हमेशा अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए ये कोशिश करता है. इस किताब में अगरेचे फ़ातिमा ने ज़ुलफ़िक़्क़ार संगठन की मौजूदगी से इनकार तो नहीं किया लेकिन जनरल ज़िया-उल-हक़ के दौर में पीआईए के यात्री विमान के काबुल अपहरण में मीर मुर्तज़ा के शामिल होने से ज़रूर इनकार किया है.
उनका लिखना है कि अपहरणकर्ताओं के नेता सलाहुद्दीन टीपू का ज़ुल्फ़िक़ार से कुछ लेना देना नहीं था और उसने ये कार्रवाई ख़ुद ही की थी.
किताब में इसके बारे में मीर मुर्तज़ा भुट्टो के एक क़रीबी साथी के हवाले से बताया गया है 'वह (टीपू) ख़ुद हमारे पास आया था.'
ज़ुल्फ़िक़ार में शामिल होने के लिए ज़रूरी था कि संगठन के नेता किसी का चयन करें न कि ख़ुद शामिल हों.
किताब में एक और दिलचस्प बात फ़ातिमा का ये कहना है कि बेनज़ीर भुट्टो ने अब कुख्यात अमरीकी सुरक्षा कंपनी ब्लैक वाटर से चुनाव के दौरान उनकी सुरक्षा के लिए संपर्क किया था लेकिन कंपनी ने अपनी सेवा देने से इनकार कर दिया था.
एक इंटरव्यू में फ़ातिमा का कहना है कि उन्हें राजनीति से ज़्यादा लिखने-पढ़ने में दिलचस्पी है. पत्रकार और लेखक ही उनके हीरो रहे हैं. लेकिन पाकिस्तान में वंशानुगत राजनीति इतनी ज़ालिम है कि आज के बहुत से राजनेताओं को अंत तक अपनी ओर खींच ही लेती है.
ये लोग अगर राजनीति के बजाए आज कुछ और व्यस्तता रखते तो शायद ज़्यादा नाम कमा लेते. यही हाल क्या फ़ातिमा का भी इंतज़ार कर रहा है?












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