'तिब्बत की संस्कृति को नष्ट कर रहा है चीन' (लीड-1)
थर्मन ने कहा कि तिब्बत को वहां के लोगों को वापस सौंप दिया जाना चाहिए, क्योंकि वहां का पर्यावरण व्यापाक तौर पर दूषित हो रहा है और मात्र तिब्बती लोग ही उसे संरक्षित कर सकते हैं।
थर्मन ने कहा कि तिब्बत में भारत-बौद्ध दार्शनिक परंपराओं का अमृत भरा पड़ा है, जो हजारों साल प्रचीन नालंदा से संबंधित है। यदि ज्ञान के उस बहुमूल्य खजाने को अक्षुण्ण बनाए रखना है तो उसकी संस्कृति का संरक्षण करना होगा।
थर्मन मंगलवार को देर शाम राजधानी के इंडिया हैबिटेट सेंटर में 'व्हाई तिब्बत मैटर्स' विषय पर आयोजित चर्चा में बोल रहे थे।
थर्मन दलाई लामा के करीबी माने जाते हैं। उन्होंने कहा कि दलाई लामा के बारे में चीनी पागलपन का थाह लगा पाना कठिन है, क्योंकि उन्होंने कभी भी किसी चरमवादी समाधान की वकालत नहीं की थी, बल्कि एक बीच के रास्ते की वकालत की थी।
थर्मन कोलंबिया युनिवर्सिटी में इंडो-तिब्बतन स्टडीज के प्रोफेसर हैं। उन्होंने बौद्ध धर्म पर कई किताबें लिखी हैं और कई का संपादन और अनुवाद किया है।
थर्मन ने कहा कि चीन तिब्बत का उपनिवेशीकरण कर रहा है, वहां के धर्म और संस्कृति को नष्ट कर रहा है और उसे हान चीनी आबादी में मिलाना चाहता है।
थर्मन ने कहा, "तिब्बत को एक अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण बाग के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए। एशिया की कई सारी नदियां तिब्बत घाटी से निकलती हैं और नीचे के क्षेत्रों में आकर लाखों लोगों की मदद करती हैं। लेकिन जंगलों की भारी कटाई के कारण वहां का पर्यावरण बुरी तरह दूषित हो रहा है।"
थर्मन ने कहा, "इसलिए अन्य कारणों के अलावा इस कारण से भी तिब्बत को वहां के लोगों को सुपुर्द कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि वे भू संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण करना जानते हैं।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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