सफल व्यवसाय का प्रतिरूप बना झारखण्ड खादी बोर्ड

नई दिल्ली, 25 फरवरी (आईएएनएस)। देश के 33 खादी बोर्डो में सबसे छोटा झारखण्ड राज्य खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड भारत के अन्य सभी खादी बोर्डो के लिए व्यापार और सामाजिक विकास का प्रतिरूप बन गया है।

बोर्ड के अध्यक्ष जयनंदु ने राजधानी में आईएएनएस को बताया कि बिहार के विभाजन के बाद साल 2004 में आधारभूत सुविधाओं के अभाव में शुरू हुआ खादी बोर्ड आज पांच करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार कर रहा है और राज्य व देशभर में इसकी इकाईयां शुरू हो गई हैं। उन्होंने बताया कि पिछले पांच वर्षो के दौरान कारोबार में प्रतिवर्ष 20 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है।

बोर्ड के अध्यक्ष को प्रधानमंत्री और कुटीर, लघु व मझौले उद्यम मंत्रालय ने राजधानी स्थित विज्ञान भवन में बोर्ड की सफलता की कहानी बयां करने के लिए आमंत्रित किया था। अन्य खादी बोर्डो के प्रतिनिधि भी इसमें शामिल हुए थे।

अध्यक्ष ने कहा, "पिछले पांच वर्षो के दौरान हमने गांवों में 10,000 बुनकरों और शिल्पकारों को रोजगार दिया है और देशभर में एक दर्जन वातानुकूलित खादी इकाईयां शुरू की हैं। झारखण्ड खादी बोर्ड अकेला ऐसा संगठन है जो लाभ में है और बिना किसी सरकारी मदद के चल रहा है।"

झारखण्ड को दुनियाभर में उसकी टसर और कछाई रेशम के लिए जाना जाता है। पश्चिम सिंघभूम के कोल्हान, खारस्वान और सरायकेला क्षेत्र की जनजातियां कोकून बनाती हैं।

वर्ष 2000 में झारखण्ड के गठन से पहले तक ये कोकून मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के बुनाई केंद्रों को पहुंचाए जाते थे क्योंकि यहां का जनजातीय समुदाय कोकून से धागे निकालना और रेशम बुनना नहीं जानता था।

जयनंदु कहते हैं कि जब झारखण्ड बिहार का हिस्सा था तब सभी 20 खादी बोर्ड बंद पड़े थे। उन्होंने कहा, "लेकिन हमने कोकून बनाने वालों को कताई के पहिए उपलब्ध कराए और उन्हें रेशम बुनने के लिए प्रशिक्षित किया।"

उन्होंने बताया कि भारत विश्व का करीब 60 प्रतिशत कोकून बनाता है और इन कोकूनों का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा झारखण्ड में बनता है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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