'चीनी संसद में चुप्पी तो भारतीय संसद में शोर'
अरूण कुमार
वाशिंगटन, 20 फरवरी (आईएएनएस)। प्रतिष्ठित डेमोक्रेसी सर्विस मेडल से सम्मानित तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने भारतीय लोकतंत्र की यह कहते हुए प्रशंसा की है कि चीन के ठीक विपरीत भारतीय लोकतंत्र में हर किसी को अपने विचारों की अभिव्यक्ति की आजादी है।
कांग्रेस लाइब्रेरी में शुक्रवार को आयोजित एक समारोह में यह पुरस्कार प्राप्त करने के बाद दलाई लामा ने कहा, "मैं भारतीय और चीनी संसद में बड़ा अंतर महसूस करता हूं।"
दलाई लामा ने कहा, "चीनी संसद में जहां बिल्कुल चुप्पी रहती है, वहीं भारतीय संसद में अत्यधिक शोर होता है।"
डेमोक्रेसी सर्विस मेडल की स्थापना नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (एनईडी) ने की है। दलाई लामा को यह पुरस्कार प्रदान किए जाने के एक दिन पहले राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बीजिंग की आपत्ति के बावजूद व्हाइट हाउस में उनकी अगवानी की थी।
मानवीय मूल्यों और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति अपनी निजी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए दलाई लामा ने कहा, "बदलाव जनता के बीच से होकर होना चाहिए। मानवाधिकारों की रक्षा समाज के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।"
भारतीय लोकतंत्र के अपने अनुभव के बारे में चर्चा करते हुए दलाई लामा ने अपनी पुरानी स्मृतियों को ताजा किया। उन्होंने कहा, "तिब्बत के मुद्दे पर नेहरू और आचार्य कृपलानी में गहरा मतभेद था।"
दलाई लामा ने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तिब्बत के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाए जाने के खिलाफ थे, जबकि प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता कृपलानी इसके पक्ष में थे।
दलाई लामा ने कहा, "यही लोकतंत्र है।" उन्होंने कहा कि लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार द्वारा परिभाषित होता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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