ब्रिटेन में हिंदुओं की बड़ी क़ानूनी जीत

ब्रिटेन में हिंदुओं की बड़ी क़ानूनी जीत

महबूब ख़ान
बीबीसी संवाददाता, लंदन

ब्रिटेन में रहने वाले एक हिंदू व्यक्ति देवेंदर घई ने अपनी मौत के बाद दाह संस्कार हिंदू रीति से कराने की क़ानूनी लड़ाई में महत्वपूर्ण जीत हासिल की है. 71 वर्षीय देवेंदर घई की माँग रही है कि उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज़ों के अनुसार हो जिसमें शव को अग्नि की भेंट किया जाए और राख को भी पानी में बहाने की अनुमति दी जाए.

यह मुक़दमा ब्रिटेन के हाई कोर्ट से शुरू होकर अपील कोर्ट तक पहुँचा जहाँ बुधवार को फ़ैसला दिया गया कि मौजूदा क़ानूनों के तहत ही हिंदू व्यक्ति को उसके धार्मिक रीति-रिवाज़ों के अनुसार अंतिम संस्कार की इजाज़त दी जा सकती है.

देवेंदर घई ने वर्ष 2006 में न्यू कासल सिटी काउंसिल के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें हिंदू धर्म की आस्थाओं के अनुसार अंतिम संस्कार करने की इजाज़त नहीं दी गई थी. हाई कोर्ट ने भी इसी फ़ैसले को बरक़रार रखा था जिसे बुधवार को अपील अदालत ने उलट दिया है.

न्यू कासल सिटी काउंसिल का कहना था कि शवदाह गृह के अलावा किसी भी स्थान पर मानव शव को जलाना 1902 के अंतिम संस्कार क़ानून के तहत वर्जित है. न्याय मंत्रालय ने भी काउंसिल के इसी फ़ैसले का समर्थन किया था और देवेंदर घई की अपील का विरोध किया था.

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अपील अदालत के जजों ने कहा है कि जबकि देवेंदर घई ने यह स्वीकार कर लिया है कि अंतिम संस्कार के स्थान पर दीवारें और एक खुले हिस्से के साथ छत भी लगाई जाएगी तो यह अंतिम संस्कार क़ानून के दायरे में होगा. इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए देवेंदर घई ने कहा, "इस फ़ैसले ने एक वृद्ध व्यक्ति की साँसों में नया संचार भर दिया है."

इस मुक़दमे में देवेंदर घई का प्रतिनिधित्व किया बैरिस्टर प्रोफ़ेसर सतविंदर जस ने जिनका कहना था कि अपील कोर्ट के इस फ़ैसले से हिंदुओं, सिखों, बौद्ध, जैन और वैदिक रीति-रिवाज़ मानने वाले सभी समुदायों को फ़ायदा होगा कि वे मृत व्यक्तियों का अंतिम संस्कार अपनी आस्थाओं के अनुसार कर सकेंगे.

हालाँकि प्रोफ़ेसर जस का ये भी कहना था कि इस फ़ैसले पर सरकार के अभी वो फ़ैसले लागू होंगे जो स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर मौजूद हैं और हिंदू रीति के अनुसार कोई भी शवदाह गृह बनाने के लिए इन नियमों को भी पूरा करना होगा. इस फ़ैसले पर बैरिस्टर सतविंदर जस के साथ विस्तृत बातचीत देखने के लिए क्लिक करें.

पर्यावरणवादियों का ये भी सवाल रहा है कि हिंदू धार्मिक रीति के अनुसार शव को जलाकर जब अस्थियाँ या राख पानी में बहाई जाती हैं तो उससे प्रदूषण फैलता है. इस सवाल पर बैरिस्टर सतविंदर जस का कहना था कि इन चिंताओं का कोई आधार साबित नहीं हो सका है और अदालत में भी ये मुद्दा उठा, जिस पर अपीलकर्ताओं ने कहा कि शव के जलने के बाद तो सिर्फ़ राख ही बचती है जिससे प्रदूषण फैलने का कोई ख़तरा नहीं है.

बैरिस्टर सतविंदर जस का कहना था कि वैसे भी पानी में मिट्टी या अन्य तरह का कचरा तो रहता ही है और फिर वैसे भी इस फ़ैसले से मिले अधिकार के तहत कोई भी अंतिम संस्कार तमाम क़ानूनों के दायरे में रहकर ही किया जाएगा.

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