सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी है शिक्षा की अलख जगाने की मुहिम
जयकांत ठाकुर को सेवानिवृत्त हुए 27 वर्ष गुजर गए हैं लेकिन उनमें लोगों को पढ़ाने का जज्बा अब भी बरकरार है। ठाकुर ने वर्ष 1950 में समस्तीपुर के ताजपुर के एक विद्यालय में बतौर शिक्षक नौकरी प्रारंभ की थी। 27 वर्ष पूर्व वह मीनापुर उच्च विद्यालय से प्रधानाध्यापक के पद से सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने विद्यालय जाना तो बन्द कर दिया लेकिन शिक्षा दान देने का सिलसिला बंद नहीं किया।
सेवानिवृत्ति के बाद वह ऐसे घरों में शिक्षा का दीप जलाने में जुट गए जहां सदियों से अंधेरा था। ठाकुर बताते हैं कि वह अखाड़ाघाट में दलित बस्ती के एक पीपल के पेड़ के नीचे अपने दोस्त धनुषधारी ठाकुर के सहयोग से दलित बस्तियों के बच्चों को पढ़ाना प्रारंभ किया था।
प्रारंभ में इन्हें कई अभिभावकों ने बुरा-भला भी कहा परंतु अपने जुनूनी तेवर के लिए मशहूर इस शिक्षक ने हार नहीं मानी और आज पीपल के पेड़ के नीचे बांस-फूस का झोपड़ीनुमा विद्यालय बन गया है। यहां आज भी 150 बच्चे नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
ठाकुर बताते हैं कि अब 40 पेंशनधारियों की एक समिति की मदद से वह यह विद्यालय चल रहे हैं जहां छात्रों को मफुत में किताब, कॉपी और पेंसिल तथा वर्ष में एक बार वर्दी मिलती है। उन्होंने बताया कि यह समिति चंदा उगाही भी करती है तथा आने-जाने वाले लोग भी गाहे-बगाहे इस विद्यालय की मदद करते हैं।
ठाकुर के प्रयास से शुरू किए गए विद्यालय में स्थानीय तीन शिक्षित बेरोजगारों को बतौर शिक्षक रखा गया है, जिन्हें उचित पारिश्रमिक भी दिया जाता है। इस विद्यालय के छात्रों में घरेलू नौकरों, रिक्शा चालकों और ठेला चालकों के बच्चे शामिल हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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