हरित प्रौद्योगिकियों के फैलाव के लिए क्षेत्रीय केंद्रों पर चर्चा
कोपेनहेगन, 18 दिसम्बर (आईएएनएस)। कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन में इस समझौते पर तैयारी हो चुकी है कि वनों की कटाई को रोकने और विकासशील देशों को हरित प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के लिए क्षेत्रीय केंद्रों की स्थापना हेतु देशों को कितना और कैसे भुगतान करना होगा।
क्षेत्रीय केंद्रों की स्थापना का विचार भारत द्वारा नई दिल्ली में अक्टूबर महीने में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान रखा गया था। एक भारतीय अधिकारी ने यहां गुरुवार की रात कहा कि भारत इन क्षेत्रीय केंद्रों में से एक को अपने यहां स्थापित कर सकता है। इन केंद्रों का काम विकासशील देशों में हरित प्रौद्योगिकियों का तेजी के साथ फैलाव करना होगा। लेकिन ऐसा लगता है कि वानिकी के प्रस्ताव पर भारत मात खा चुका है, यद्यपि इस मुद्दे पर बातचीत अभी भी जारी है।
वनों की कटाई और वन क्षरण (आरईडीडी) के जरिए कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने का मूल प्रस्ताव लगता है यहां जुटे 192 देशों में से कई सारे देशों के बीच घर कर रहा है। भारत और चीन जैसे देश इस प्रस्ताव से दूर बने हुए हैं।
दोनों विकासशील देशों ने कहा है कि वनों की कटौती को रोकने के लिए देशों को भुगतान करने के अलावा उन देशों को भी भुगतान किया जाना चाहिए, जिन्होंने वाकई में अपने वन क्षेत्र में बढ़ोतरी की है। लेकिन धनी देश भारत और चीन को अधिक धन के भुगतान को लेकर उदासीन बने हुए हैं।
जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के सहायक अधीनस्थ महासचिव रॉबर्ट ओर्र ने आईएएनएस को बताया, "हालांकि बातचीत की इस प्रक्रिया में जब तक सभी मुद्दों पर सहमति नहीं बन जाती, तब तक समझिए किसी भी बात पर सहमति नहीं है।"
वह ऐसे समय में भी इस तरह की भाषा बोल रहे थे, जबकि वार्ताकार दो समझौतों पर बातचीत लगभग समाप्त कर चुके हैं और अब इसे अंतिम रूप दिया जाना बाकी है। इन दोनों समझौतों में पहला है यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) के तहत दीर्घकालिक सहयोग और दूसरा है क्योटो प्रोटोकाल के तहत ग्लोबल वार्मिग के खिलाफ लड़ाई हेतु समझौता।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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