राजखोवा के बच्चों की नजर में व्यापारी है अलगाववादी नेता
गुवाहाटी, 10 दिसम्बर (आईएएनएस)। पिछले सप्ताह गिरफ्तार 'युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम' (उल्फा) के नेताओं के, अपने नाम, धर्म और पहचान से विमुख बच्चे अब भी अपने जीवन और अपने पलायनवादी पिताओं की वास्तविकता को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रतिबंधित संगठन उल्फा के प्रमुख अरबिंद राजखोवा के दो बेटे खेमचन बोहागी और गदाधर उस समय आश्चर्य में पड़ गए जब उन्होंने टेलीविजन पर और छायाचित्रों में अपने पिता को हथकड़ी लगे देखा। वे लगातार अपनी मां कावेरी से पूछ रहे हैं कि क्या हुआ है।
तेरह वर्षीय बोहागी और पांच वर्षीय गदाधर अपने पिता को बांग्लादेश में काम करने वाले एक व्यापारी के रूप में जानते थे। उन्हें उनके पिता का नाम मिजानुर रहमान चौधरी बताया गया था।
दोनों बच्चों को अब गुवाहाटी में चौथी असम पुलिस बटालियन मुख्यालय के गेस्टहाउस में रखा गया है। इन बच्चों को न तो यह पता है कि वह असमिया है और न ही वह यह जानते हैं कि उनका पिता एक अलगाववादी नेता है और वह पिछले हफ्ते गिरफ्तार होने से पहले तक एक भगौड़ा था।
पूछताछ की प्रक्रिया से जुड़े एक वरिष्ठ खुफिया अधिकारी ने आईएएनएस से कहा, "दोनों बच्चे केवल बांग्ला में बोलते हैं और उन्हें विश्वास दिलाया गया था कि वे मुसलमान हैं। आज वे दोनों सशंकित हैं और लगातार हो रही घटनाओं के संबंध में अपनी मां से जानने की कोशिश कर रहे हैं।"
उनकी 41 वर्षीय मां और अरबिंद राजखोवा की पत्नी कावेरी कछारी अब भी अपने दोनों उत्सुक बच्चों को अपने पति की असली पहचान और उल्फा की महिला इकाई की प्रमुख के रूप में स्वयं की पहचान बताने से बच रही हैं।
बांग्लादेश में जन्में ये दोनों बच्चे नहीं जानते कि उनके पिता का जन्म राजीब राजकुंवर के रूप में हुआ था, उसके बाद वह असम में एक हिंसक अलगाववादी आंदोलन खड़ा करने के लिए अरबिंद राजखोवा और आखिर में मिजानुर रहमान चौधरी बन गया था।
ये अकेले बच्चे नहीं हैं, उल्फा के राजू बरुआ सहित अन्य नेताओं के बच्चे भी इसी तरह के पहचान के संकट से गुजर रहे हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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